पिछले दिनो दिल्ली के जामा मस्जिद के पास मौजूद मौलाना आज़ाद के मज़ार पर हाज़री देने का मौक़ा मिला। वहीं पर एक साहब ने बताया के पास ही मौलाना शौकत अली भी आराम फ़रमा रहे हैं, ये मेरे लिए बिलकुल ही नई जानकारी थी; क्युंके मै काफ़ी दिनों से मौलाना शोकत अली के मज़ार को ढूंड रहा था!

बहरहाल, मैने साहब से पूछा के कहां पर ? तो उन्होने कहा के ये जो सामने मस्जिद है ना उसी मे हैं, मै उन्हे शुक्रिया कह उस मस्जिद की जानिब बढ़ा! मैने मस्जिद के पास पहुंच क़बर ढूंडना शुरु किया; पर मुझे नही मिला! मस्जिद के अंदर मौलवी साहब बच्चे को पढ़ा रहे थे। बग़ल से ही एक रास्ता मस्जिद के उपर की जानिब जा रहा था; बहुत सारे लोग आना जाना कर रहे थे। इस लिये मै भी उपर चल दिया। उपर एक और मस्जिद थी।

नमाज़ पढ़ कर बाहर आ रहे एक चचा से मैने पूछा : हुज़ूर बाहर किसी ने बताया के इस मस्जिद में मौलाना शौकत अली आराम फ़रमा रहे हैं! ये सुनते ही उन्होने मस्जिद के बीच में ऐशारा किया और कहा : वो रहे!

ये मस्जिद के पहले तल्ले पर मौजूद क़बर था। मै बहुत हैरत में था के मस्जिद के बीचो बीच वो भी पहले तल्ले पर क़बर कैसे ? जब अच्छे से ग़ौर किया तो पता चला के ये क़बर मस्जिद के पहले तल्ले पर नही है। बल्के क़बर ही जामा मस्जिद से सटे होने की वजह कर काफ़ी उंचाई पर है। जिसमे जाने के लिए उपर चढ़ना पड़ता है। मस्जिद क़बर के उपर बनी है, और मस्जिद का नाम भी मौलाना शौकत अली मस्जिद रखा गया है। वैसे मस्जिद में दफ़न होने का ये कोई पहला मामला नही है! मौलाना शौकत अली के छोटे भाई मौलाना मुहम्मद अली जौहर ख़ुद भी फ़लस्तीन में मौजूद मस्जिद ए अक़्सा के अहाते में दफ़न हैं।

आख़िर इस भारतीय को येरुशलम में क्युं दफ़न किया गया ?

वैसे एक बात क़ाबिल ए ज़िक्र है, के अल्लामा इक़बाल का इंतक़ाल 21 अप्रैल 1938 को हुआ था और उन्हे लाहौर की बादशाही मस्जिद के आहते में दफ़न किया गया, क्युंके वो हिन्दुस्तान के मुसलमानो के एक बड़े नायक थे। ठीक एैसा ही मौलाना शौकत अली के साथ भी हुआ। उन्हे हिन्दुस्तान के इलावा विदेशों भी लोग बहुत चाहते थे! तुर्की, अरब, अफ़्रीका से लेकर योरप और अमेरिका तक उनके चाहने वाले मौजूद थे। इस लिए उनके इंतक़ाल के बाद उन्हे इज़्ज़त देने की नियत से दिल्ली के जामा मस्जिद के मेन गेट की ठीक दाईं जानिब दफ़न किया गया; जो रास्ता मीना बाज़ार की जानिब निकलता है। दिल्ली की जामा मस्जिद उस हिन्दुस्तान के मुसलमानो का मरकज़ था। जिसकी पहले और आज भी बहुत अहमियत है।

यहां पर एक मज़ेदार चीज़ यह है के क़बर पर लगे पत्थर पर मौलाना शौकत अली के वफ़ात की तारीख़ 18 नवम्बर 1938 है। पर कई अख़बार के हवाले से ये पता चलता है के मौलाना का इंतक़ाल 26 नवम्बर 1938 को करोल बाग़ मे हुआ। और उन्हे दर्जनो सेंट्रल असेम्बली के मेम्बर की उपस्थिती में हज़ारों लोगों के बीच 28 नवम्बर 1938 को जामा मस्जिद के आहते में दफ़न कर दिया गया।