ध्रुव गुप्त

आज हिंदी के महाकवि गोपाल दास नीरज का देहावसान हिंदी गीतों के एक युग का अंत है। 93 साल की उम्र एक जीवन के लिए कम नहीं होती, लेकिन गंभीर बीमारी की हालत में उनका ऐसे चुपचाप चले जाना हमारे अंतर्मन पर व्यथा के कुछ गहरे धब्बे ज़रूर छोड़ गया है।

प्रेम और विरह के यशस्वी गीतकार नीरज के गीतों के श्रृंगार ने कभी हमारे युवा सपनों को आसमान और परवाज़ बख़्शा था। उनके गीतों में खामोशी से चीखती विगत प्रेम की वेदना ने कभी हमारी नम आंखों को रूमाल और आंसुओं को तकिया मुहैय्या कराया था। हमारी पीढ़ी के लोग उनके शब्दों में मुखर श्रृंगार और उदासियों की पीड़ा के साथ ही जवान और बूढ़े हुए।

अपनी बेपनाह रूमानियत से नीरज जी ने हिंदी गीतों और ग़ज़लों को समृद्ध किया है। यह और बात है कि हिंदी की पूर्वग्रहग्रस्त आलोचना ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे वाकई हकदार थे। साहित्य के अलावा हिंदी फ़िल्मी गीतों को नया तेवर, कोमलता और संस्कार देने के लिए भी उन्हें जाना जाता है।

फिल्मी गीतकार के तौर पर उनकी पहली फिल्म थी संगीतकार रोशन के साथ ‘नई उमर की नई फसल’ जिसके गीतों – ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’, ‘देखती ही रहो आज दर्पण न तुम’ और ‘आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है’ ने धूम मचा दी थी। उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं – मेरा नाम जोकर, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, पहचान, पतंगा, चा चा चा, दुनिया, शर्मीली, प्रेम पुजारी, कल आज और कल, चंदा और बिजली, फरेब, लाल पत्थर और कन्यादान।

अगाध प्रेम और शाश्वत विरह के इस महाकवि के महाप्रयाण पर उन्हें नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहां न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।