ध्रुव गुप्त

मुंबई का सबसे पुराना और सबसे मशहूर प्रोडक्शन हाउस आर.के स्टूडियो महज़ एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं, एक सपने का नाम था। हिंदी सिनेमा के उस सपने का नाम जिसे पिछली सदी के चौथे दशक में स्वप्नदर्शी अभिनेता, निर्माता और निर्देशक स्व.राज कपूर और उनकी टीम के साथियों – नर्गिस, ख्वाजा अहमद अब्बास, शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, मुकेश और राधू करमाकर ने मिलकर देखा था। अपनी निर्माण संस्था आर.के फिल्म्स की स्थापना के साथ 1948 में राज कपूर ने मुंबई के चैंबूर में इस स्टूडियो की स्थापना की थी। ‘आग’ इस स्टूडियो में बनने वाली पहली फिल्म थी। उसके बाद यह हिंदी की कई बेहतरीन और कालजयी फिल्मों – बरसात, आवारा, बूट पॉलिश,अब दिल्ली दूर नहीं, जागते रहो, श्री 420, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, मेरा नाम जोकर, सत्यम शिवम् सुन्दरम, बॉबी और राम तेरी गंगा मैली के निर्माण का गवाह बना। राज कपूर के जाने के बाद उनकी संतानों के पास न तो वो स्वप्नदर्शी आंखें रहीं और न फिल्म निर्माण की वह अलग-सी दृष्टि। धीरे-धीरे यह स्टूडियो हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा से अलग होता चला गया। डेढ़ साल पहले इस स्टूडियो में भीषण आग लगी। उस सदमे से यह उबर भी नहीं पाया था कि कुछ ही दिनों पहले इसे बेच दिया गया। इसे गोदरेज प्रॉपर्टीज ने खरीदा है तो ज़ाहिर है कि अब इसे तोड़कर कोई मॉल बनेगा या किसी कंपनी का दफ्तर। हिंदी सिनेमा के इतिहास के एक गौरवपूर्ण अध्याय का यह अंत हिंदी सिनेमा के प्रेमियों के लिए सदमे जैसा है। अब न वहां राज कपूर की आत्मा होगी और न वे बेशुमार ख्व़ाब जो राज जी और उनके साथी फिल्मकारों की एक पूरी पीढ़ी ने देखा था।

अलविदा आर.के स्टूडियो !

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।