ध्रुव गुप्त

‘महापंडित’, ‘आधुनिक बुद्ध’ और ‘घुमक्कड़ मनीषी’ के नामों से प्रसिद्द स्व. राहुल सांकृत्यायन भारतीय साहित्य और संस्कृति के सबसे विराट व्यक्तित्वों में एक रहे हैं। बौद्ध भिक्षु से लेकर मार्क्सवादी चिन्तक तक की उनकी जीवन-यात्रा इतने मुकामों और विविधताओं से गुज़री है कि उसपर सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है।

राहुल सांकृत्यायन, भोजपुरी सम्मेलन और बलिया

बौद्ध भिक्षु के रूप में उन्होंने जीवन के 45 साल घुमक्कड़ी में गुज़ारे। इस दौरान उन्होंने सड़क मार्ग से नेपाल, श्रीलंका, चीन, ईरान, मध्य एशिया और तिब्बत की निरंतर यात्राएं की। तिब्बत की दुर्गम घाटियों में उन्होंने हजारों विलुप्त बौद्ध ग्रंथों की पांडुलिपियों, पाली और प्राकृत साहित्य, धर्म और दर्शन की अमूल्य पुस्तकों और चित्रों की खोज की जिन्हें सदियों पहले विदेशी हमलावरों से बचाने के लिए कुछ बौद्ध भिक्षु नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों से चोरी- चोरी तिब्बत ले गए थे। ये तमाम पांडुलिपियां और ग्रंथ पटना संग्रहालय की राहुल सांकृत्यायन दीर्घा में सुरक्षित हैं।

यायावरी से लौटने के बाद राहुल जी ने देश में ज़ारी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की। अपने ब्रिटिश शासन-विरोधी भाषणों और लेखों के लिए उन्हें तीन साल के कारावास की सज़ा झेलनी पड़ी थी। परवर्ती जीवन -काल में राहुल जी मार्क्सवाद से गहरे रूप से जुड़े और आजीबन मार्क्सवादी रहे।

वे हिंदी, भोजपुरी और संस्कृत के अलावा इंग्लिश, रसियन, फ्रेंच, सिंहली, तमिल, कन्नड़, अरबी और फ़ारसी भाषाओं के विद्वान् थे। उन्होंने कई भाषाओं में उपन्यास, नाटक, यात्रा-वृतांत, संस्मरण जैसी विधाओं और इतिहास, दर्शन, धर्म, भाषाशास्त्र, व्याकरण और मार्क्सवाद जैसे विषयों पर एक सौ से ज्यादा पुस्तकों की रचना की।

उनकी कुछ बहुचर्चित पुस्तकें हैं – वोल्गा से गंगा , दिवोदास, किन्नर देश, विस्मित यात्री, भागो नहीं दुनिया को बदलो, बीसवी सदी, पांच भोजपुरी नाटक, मध्य एशिया का इतिहास, मेरी जीवन-यात्रा, बचपन की स्मृतियां, सरदार पृथ्वी सिंह, महामानव बुद्ध, ऋग्वैदिक भारत, घुमक्कड़ शास्त्र, कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग आदि।

भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के इस विलक्षण व्यक्तित्व की जयन्ती पर हमारी हार्दिक श्रधांजलि !

ध्रुव गुप्त : लेखक पुर्व आईपीएस हैं।