अफ़रोज़ आलम साहिल

महात्मा गांधी दक्षिण अफ़्रीक़ा से भारत लौटने के बाद जिस शख़्स के कारण बिहार में टिके और आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका अदा दी, उस शख़्स का नाम है मौलाना मज़हरूल हक़ (बैरिस्टर).

10 अप्रैल 1917 को गांधी चम्पारण के राजकुमार शुक्ल के साथ जब कलकत्ता से पटना पहुंचे तो राजकुमार शुक्ल उन्हें डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के घर ले गए. डॉ. प्रसाद अपने घर पर नहीं थे, शायद वो पुरी गए हुए थे. उनके बंगले पर एक-दो नौकर थे. घर पर मौजूद डॉ. प्रसाद के नौकरों ने गांधी के साथ सही व्यवहार नहीं किया. गांधी को टॉयलेट जाने की ज़रूरत थी. राजकुमार शुक्ल ने घर के अन्दर वाले टॉयलेट का इस्तेमाल करने को कहा, लेकिन डॉ. प्रसाद के इन नौकरों ने गांधी को बाहर का रास्ता दिखा दिया. गांधी इससे बेहद आहत हुए. वे वापस जाने के लिए सोचने की हद तक परेशान हो गए. इसी बीच उन्हें याद आया कि मौलाना मज़हरूल हक़ लंदन में साथ पढ़ते थे. 1915 में कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन में हुए उनसे मुलाक़ात की याद भी गांधी को आई, जब मज़हरूल हक़ ने अपनी पुरानी पहचान बताकर कहा था, ‘आप कभी पटना आएं तो मेरे घर अवश्य पधारिये.’

बस फिर क्या था. गांधी ने तुरंत उन्हें तार भेजा. हालांकि राजकुमार शुक्ल अपनी डायरी में लिखते हैं कि गांधी ने राजकुमार शुक्ल को ही मज़हरूल हक़ के घर भेजा था. राजकुमार शुक्ल अपनी डायरी में लिखते हैं – ‘गांधी जी के आदेश से मैं मज़हरूल हक़ साहब से मिला. मज़हरूल हक़ साहब अपनी गाड़ी में मुझे बैठाकर गांधी जी के पास पहुंचे….’ मज़हरूल हक़ डॉ. प्रसाद के घर पहुंचे और गांधी को अपने घर ले गए. उन्होंने गांधी को उचित सम्मान दिया और आगे के मक़सद पर बातचीत की. चम्पारण जाने के रास्तों से उन्हें रूबरू कराया. बल्कि गांधी उनकी मदद से ही चम्पारण पहुंचे. चम्पारण में अहिंसारूपी सत्याग्रह किया. उसके बाद देश की आज़ादी में जो कुछ हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज है. अगर मज़हरूल हक़ उस महत्वपूर्ण मोड़ पर गांधी का साथ न देते तो शायद देश की तक़दीर और खुद गांधी की तक़दीर कुछ अलग होती.

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बताते चलें कि चम्पारण के मोतिहारी में गांधी पर जब मुक़दमा हुआ तो इसकी ख़बर मिलते ही मज़हरूल हक़ यहां पहुंच गए. बल्कि गांधी ने एक बैठक भी आयोजित की जिसमें यह निर्णय लिया गया कि गांधी के जेल जाने के बाद मज़हरूल हक़ और ब्रजकिशोर प्रसाद आन्दोलन का नेतृत्व करेंगे. ये अलग अलग बात है कि गांधी पर से मुक़दमा ही वापस ले लिया गया.

चम्पारण के रैयतों पर अग्रेज़ों द्वारा किए जाने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ गांधी ने अपनी जांच-पड़ताल शुरू कर दी. इस जांच-पड़ताल में मज़हरूल हक़ ने सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में अपना नाम दर्ज कराया और शान की ज़िन्दगी छोड़कर सीधा-सादा जीवन बिताने लगे. गांधी ने इसका ज़िक्र अपनी आत्मकथा में कई जगह किया है. कुछ जगहों पर मज़हरूल हक़ को गांधी ने ‘जेंटिल बिहारी’ के नाम से याद किया है.

कहते हैं कि मज़हरूल हक़ अपने शान-शौकत वाली ज़िन्दगी के लिए पूरे बिहार में मशहूर थे. लेकिन चम्पारण सत्याग्रह ने मज़हरूल हक़ पर गहरा प्रभाव डाला और वे पूरी तरह से गांधीवादी बन गए. चम्पारण में गांधी की जांच मुकम्मल होने के बाद मज़हरूल हक़ गांधी को जनवरी 1918 में मोतिहारी से छपरा ले गए, जहां गांधी ने मुसलमानों की एक सभा में हिन्दू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करने वाली बातों को रखा. इस सभा में मज़हरूल हक़ ने तक़रीर की और सबको सोचने पर मजबूर कर दिया. छपरा से फिर दोनों एक साथ मोतिहारी गए और फिर वहां से पटना रवाना हो गए. पटना पहुंच कर भी मज़हरूल अपने बीवी से मिलने नहीं गए, बल्कि उन्हें पत्र लिखकर बताया, ‘अगर वायसराय अली बंधुओं (मुहम्मद अली व शौकत अली) को रिहा करते हैं तो ठीक है, नहीं तो भारत में इसके ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा आन्दोलन होगा जैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ है. इस आन्दोलन में मैं भी भाग लूंगा और शायद इस आन्दोलन में हम सभी को जेल भी जाना पड़े.’

चम्पारण सत्याग्रह के मास्टरमाइंड व कानपुर से निकलने वाले प्रताप अख़बार के संवाददाता पीर मुहम्मद मूनिस (अंग्रेज़ इन्हें अपने खुफ़िया दस्तावेज़ों में बदमाश व आतंकी पत्रकार बता चुके हैं) ने 16 सितंबर 1920 को मौलाना मज़हरूल हक़ से बातचीत की. यह बातचीत प्रताप अख़बार के 11 अक्टूबर, 1920 के अंक में ‘असहयोग और मज़हरूल हक़’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी.

इस बातचीत की भूमिका पीर मुहम्मद मूनिस कुछ इस प्रकार लिखते हैं, ‘महात्मा गांधी के असहयोग कार्यक्रम के संबंध में मुझे पटना जाना पड़ा. तारीख़ 16 सितंबर को प्रातः काल क़रीब सात बजे मिस्टर मज़हरूल हक़ के सिकंदर मंज़िल में पहुंचा. भीतर दाखिल होने पर मैं अवाक् रह गया. क्योंकि इस स्थान को कुछ दिन पहले मैंने देखा था, अब वह स्थान उस शानों-शौकत का नहीं रहा. जिन जगहों पर विलायती कुर्सियां रहती थीं, वहां पर कालीन बिछे हुए थे. आराम कुर्सी का काम मसनद से लिया जा रहा था. संपूर्ण हॉल दरी और कालीन से सजा हुआ था. आलमारियों में अरस्तू, शेक्सपीयर, कालीदास, सादी नज़र आ रहे थे. अहलेलाल, इंडिपेंडेंट आदि पत्रिकाओं की पुरानी प्रतियां भी सामने रखी हुई थीं. एकदम रंग बदला हुआ था. विलायती चीज़ों की जगह स्वदेशी चीज़ें दिखाई पड़ती थीं. मिस्टर मज़हरूल हक़ स्वदेशी पोशाक पहने बैठे थे – मारकीन का कुर्ता और पायजामा. महात्मा गांधी के समान टोपी, सामने कालीन पर रखी हुई थी. बिहार के इस नेता को इस वेश में देखकर देश का भविष्य नेत्रों के सामने दिखाई पड़ने लगा. मन में अनेक प्रकार की उमंगे उठने लगीं, उसी उमंगी में आकर मैंने मिस्टर हक़ से सवाल पूछने शुरू कर दिए….’

एक लंबी बातचीत में पीर मुहम्मद मूनिस ने मज़हरूल हक़ से जब पूछा कि असहयोग के लिए आप क्या कर रहे हैं? तो मज़हरूल हक़ का जवाब था, ‘मैं काउंसिल की उम्मीदवारी से हट जाऊंगा, मैं लड़के को स्कूल से हटा लेने के लिए हेडमास्टर को पत्र लिख चुका हूं, मैं बैरिस्टरी छोड़ दूंगा, मेरे पास ख़िताब तो है नहीं, अगर होता, तो उसे भी वापस कर देता…’

राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक ‘मेरे असहयोग के साथी’ में मज़हरूल हक़ के बारे में लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता और देश के लिए इतना ज़बरदस्त दीवाना बीसवीं शताब्दी में दूसरा कोई मुसलमान हुआ, इसका मुझे पता नहीं.’

मज़हरूल हक़ के बारे में गांधी ने लिखा था, ‘मज़हरूल हक़ एक निष्ठावान देशभक्त, अच्छे मुसलमान और दार्शनिक थे. बड़ी ऐश व आराम की ज़िन्दगी बिताते थे पर जब असहयोग का अवसर आया तो पुराने किंचली की तरह सब आडम्बरों का त्याग कर दिया. राजकुमारों जैसी ठाठबाट वाली ज़िन्दगी को छोड़ अब एक सूफ़ी दरवेश की ज़िन्दगी गुज़ारने लगे. वह अपनी कथनी और करनी में निडर और निष्कपट थे, बेबाक थे. पटना के नज़दीक सदाक़त आश्रम उनकी निष्ठा, सेवा और करमठता का ही नतीजा है. अपनी इच्छा के अनुसार ज़्यादा दिन वह वहां नहीं रहे, उनके आश्रम की कल्पना ने विद्यापीठ के लिए एक स्थान उपलब्ध करा दिया. उनकी यह कोशिश दोनों समुदाय को एकता के सूत्र में बांधने वाला सीमेंट सिद्ध होगी. ऐसे कर्मठ व्यक्ति का अभाव हमेशा खटकेगा और ख़ासतौर पर आज जबकि देश अपने एक ऐतिहासिक मोड़ पर है, उनकी कमी का शिद्दत से अहसास होगा.’

महात्मा गांधी ने मज़हरूल हक़ के लिए ये बातें उनके देहांत पर संवेदना के रूप में 9 जनवरी 1930 को यंग इन्डिया में लिखी थीं. वहीं पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, ‘मज़हरूल हक़ के चले जाने से हिन्दू-मुस्लिम एकता और समझौते का एक बड़ा स्तंभ टूट गया. इस विषय में हम निराधार हो गए.’

दरअसल, मौलाना मज़हरूल हक़ आज़ादी की लड़ाई के एक समर्पित सेनानी थे. वे पूरी शिद्दत के साथ इस क़वायद में शामिल रहें. महात्मा गांधी को हौसला देने से लेकर क़दम-क़दम पर उनके साथ इस जंग में खड़े रहें. पर इतिहास ने गांधी को तो बखूबी याद रखा, मगर बिहार के मौलाना मज़हरूल हक़ को भूला दिया. उनके योगदान को न तो कोई प्रसिद्धी मिली और न ही कोई उचित जगह. कांग्रेस पार्टी ने भी मज़हरूल हक़ के साथ इंसाफ़ नहीं किया. जबकि वो बिहार में कांग्रेस के तमाम बड़े प्रोग्रामों व नीतियों के सुत्रधार रहे थे. आज उनके ही सदाक़त आश्रम में बिहार कांग्रेस का मुख्यालय है. लेकिन आज आलम यह है कि इसी सदाक़त आश्रम में उनके नाम पर बनी लाइब्रेरी में उनसे जुड़ी कोई जानकारी नहीं है. यहां के अधिकारी मज़हरूल हक़ को जानते तक नहीं हैं.

मौलाना मज़हरूल हक़ के वारिस आज भी उसी पटना में गुमनाम ज़िन्दगी जी रहे हैं, जिस पटना में मज़हरूल हक़ सैकड़ों एकड़ ज़मीन देश के नाम पर कांग्रेस को क़ुर्बान कर दिया. इस देश का दुर्भाग्य ही है, जहां मज़हरूल हक़ जैसे सच्चे, ईमानदार स्वतंत्रता सेनानी हाशिए पर लाकर भूला दिए गए हैं और सियासत के नाम पर सौदेबाज़ी करने वाले अगली क़तारों में खड़े हैं.

(लेखक इन दिनों मौलाना मज़हरूल हक़ के चम्पारण सत्याग्रह में रोल पर शोध कर रहे हैं. वो मौलाना मज़हरूल हक़ पर इस संदर्भ में पुस्तक लाने की तैयारी में हैं.)