सैयद महमूद का जन्म 1889 में ग़ाज़ीपुर के सईदपुर, भिटारी में हुआ था। उनके पूर्वज बिहार के थे और बीच के कुछ सालो में उनका ख़ानदान ग़ाज़ीपुर चला गया था, जहाँ से वे फिर बिहार वापस आ गए।

सैयद महमूद के वालिद का नाम मुहम्मद उमर और दादा का क़ाज़ी फ़रज़ंद अली था। शुरुआती तालीम मुकम्मल करने बाद 1901 में अलीगढ़ भेजा गया जहां आपकी दोस्ती तसद्दुक़ अहमद ख़ान शेरवानी,अब्दुर रहमान बिजनौरी, सैयद हुसैन और सैफ़ुद्दीन किचलु वग़ैरा से हुई।

सैयद महमूद शुरु से ही कांग्रेस के समर्थक रहे और अलीगढ़ में अपने साथियों के साथ मिलकर लगातार युवा मुस्लिमो को कांग्रेस की तरफ़ लाने की कोशिश करते रहे। 1905 में बनारस हुए कांग्रेस सेशन मे अपने साथियों के साथ हिस्सा लिया।

फ़रवरी 1907 में सैयद महमूद ने कॉलेज प्राशासन के ख़िलाफ़ इस्ट्राईक कर दिया जिस वजह कर सैयद महमूद सहित छ: स्टुडेंट को सज़ा दी गई और इस तरह पढ़ाई के दौरान ही सियासत में हिस्सा लेने की वजह कर सैयद महमुद अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज से निकाल बाहर कर दिए गए।

इसके बाद सैयद महमूद बैरिस्टर बनने की नियत से लंदन गए। वहां भी सियासत जारी रहा और कुछ स्टुडेंट को मिला कर एक तंज़ीम बनाया और ‘अमीर अली’ से भिड़ गए जो इंगलैंड मे मुस्लिम लीग की लंदन शाखा चला रहे थे।

1909 में सैयद महमूद की मुलाक़ात और जान पहचान गांधी और नेहरु से लंदन मे हुई और यहां हुई दोस्ती ताउम्र क़ाएम रही, इसी दौरान कैम्ब्रिज से उन्होने मुग़ल दौर की सियासत और प्रशासन पर एक थेसिस लिखा और 1912 में जर्मनी के एक इदारे पी.एच.डी किया और सैयद महमूद से डॉक्टर सैयद महमूद हो कर हिन्दुस्तान लौटे।

1913 में डॉ सैयद महमूद ने पटना आ कर मौलाना मज़हरुल हक़ की ज़ेर ए निगरानी लीगल  प्रैकटिस करने लगे। और 1915 में मौलाना मज़हरुल हक़ की भतीजी से शादी भी हो गई।

मौलाना मज़हरुल हक़ की ज़ेर ए निगरानी रहने की वजह कर डॉ सैयद महमूद मे उनकी बहुत सी ख़ुबी आ गई और इस तरह वो उन कुछ युवा मुस्लिम नेताओं में जाने गए जिन्होंने 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ पैक्ट करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसी दौरान डॉ सैयद महमूद ने होम रूल आन्दोलन हिस्सा लिया और ख़िलाफ़त तहरीक व असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने की ग़र्ज़ से वकालत का पेशा छोड़ दिया और साथ ही The Khilafat & England नाम से एक किताब भी लिखी।

1921 में डॉ सैयद महमूद ख़िलाफ़त कमिटी के महासचिव बने और 1922 में जेल भेज दिए गए। और जेल से छुटने के बाद 1923 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उप महासचिव के पद के लिए जवाहर लाल नेहरु के साथ चुना गया, जिसके बाद महमुद और नेहरु की दोस्ती को एक नया आयाम मिला।

1929 में डॉ सैयद महमूद ने मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी का गठन डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी के साथ मिल कर किया।

1929 में ही कांग्रेस के महासचिव बने और इस पद पर 1936 तक बने रहे।

1930 में डॉ सैयद महमूद सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लेने की वजह कर मोती लाला नेहरू और जवाहर लाल नेहरु के साथ इलाहाबाद के नैनी जेल में क़ैद रहे।

1937 में केंद्रीय और प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस की व्यापक जीत के बाद सैयद महमूद को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की बात थी, लेकिन लेकिन एैन मौक़े पर राजेंद्र प्रासाद की अंतरात्मा जाग गई और बिहार केसरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया तो श्रीकृष्ण सिन्हा के मंत्रिमंडल में डॉ सैयद महमूद कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल हुए थे।

डॉ सैयद महमुद 1937 में बिहार की कांग्रेस सरकार में शिक्षा, विकास एवं रोज़गार के मंत्री रहे, उन्होने साल के आख़िर मे पटना शहर में एक बाढ़ कांफ़्रेंस का आयोजन किया जिसमे पहली बार एक बहु उपयोगी रिवर वैली कार्यकर्म के बारे में बात की गई, जिससे की बाढ़ के विनाशकारी असर को कम किया जा सके। डॉ राजेंंद्र प्रासाद ने डॉ सैयद महमुद को उनकी मेहनतो के लिए सराहा था।

इसी दौरान हिन्दी उर्दु के तनाज़ु के कम करने की नियात से एक अख़बार ‘रौशनी’ निकाला जो हिन्दी और उर्दु दोनो ज़ुबान मे शाय होता था।

1939 में डॉ सैयद महमुद ने एक किताब “आ प्लान ऑफ़ प्रोवेनशियल रिकंस्ट्रकशन” लिखा, जिसमे उन्होने खेती, सींचाई, शिल्प, स्वास्थ, शिक्षा, उधोग इत्यादी पर ज़ोर दिया, ये किताब इतनी मशहुर हुई के उसी साल इसका कई एडिशन शाय हुआ।

1940 में डॉ सैयद महमुद ने मुस्लिम लीग के बटवारे की निती का खुल कर विरोध किया और अखंड भारत की वकालत की।

1942 में कांग्रेस की उस कमिटी का हिस्सा थे जिसने “भारत छोड़ो” तहरीक छेड़ी, और इसी साल पुरे कांग्रेस की टीम के साथ गिरफ़्तार भी हुए, अहमदाबाद जेल मे रहे, हैजा होने की वजह कर काफ़ी कमज़ोर भी हुए और 1944 में जेल से रिहा कर दिए गए तब अंग्रेज़ो ने एलान किया के डॉ सैयद महमुद ने अंग्रेज़ो से माफ़ी मांगा है और जेल से बाहर आए हैं। डॉ सैयद महमूद को अपनी ग़लती का एहसास हुआ, उन्होने माना के उन्हे एैसा नही करना था। उन्होने गांधी सहीत अपने तमाम साथियों से इस ग़लती के लिए माफ़ी मांगी।

1946 मे हुए चुनाव में डॉ सैयद महमुद कांग्रेस के टिकट पर मोमिन कांफ़्रेंस के समर्थन से चम्पारण सीट से चुनाव मे जीत हासिल करते हैं।

1946-52 के दौरान डॉ सैयद महमुद यातायात, कृषि और उधोग मंत्रालय के कार्यभार को संभाला।

इसी दौरान बिहार मे मुस्लिम मुख़ालिफ़ फ़साद  कांग्रेस द्वारा 26 अक्तुबर 1946 को छपरा शहर से शुरु किया गया।

जिसके बाद डॉ सैयद महमुद बिहार के वज़ीरआला श्री क्रिष्ण सिंह के साथ वहां पहुंच गए, इस लिए सुरतहाल पर जल्द क़ाबु पा लिया गया और इसके बाद डॉ सैयद महमुद श्री क्रिष्ण सिंह के साथ मुज़फ़्फ़रपुर के दौरे पर भी गए जिससे लोगो मे एतेमाद पैदा हुआ और अफ़सरों के हौसले भी बुलंद हुए, इधर तिरहुत ये इलाक़ा तो शांत रहा पर मगध का इलाक़ा पुरी तरह से कांग्रेसीयों की वजह कर जल उठा जिसमे पुरा पटना ज़िला, गया, जहानाबाद, नालंदा, नवादा, मुंगेर बर्बादी के दहाने पर खड़ा हो गया और 28 अक्तुबर 1946 तक तो ये आग पटना से होते हुवे भागलपुर, संथाल परगना से वापस छपरा पहुंच गई।

सरकारी आकड़े के हिसाब से लगभग तीस हज़ार लोग अपने ही हमवतन के ज़रिया क़त्ल कर दिए गए जिनमे बेशतर मुसलमान ही थे, जिसके बाद डॉ सैयद महमुद मुसन्निफ़ और शायर की तंकीद का निशाना बने, क्युंके बिहार में कांग्रेस की हुकुमत थी, और उसने फ़साद रोकने की जगह भड़काया था और डॉ सैयद महमुद बिहार की हुकुमत में एक उंचे ओहदे पर थे और उन्होने कुछ नही किया।

5 मार्च 1947 को दंगे के बाद कांग्रेस पर लगे इलज़ाम पर पर्दा डालने के लिए महात्मा गांधी पटना आकर डॉ सैयद महमूद के घर में ठहरे।  (अब गांधी मैदान के उत्तर ए.एन. सिन्हा इंस्टिट्यूट)

7 मार्च 1947 को ख़ुदाई ख़िदमतगार के रज़ाकारों के साथ ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान भी पटना चले आये और गांधी के साथ डॉ सैयद महमूद के घर में रुके।

1949 में डॉ सैयद महमुद ने हिन्दुस्तान के ख़ुनी बटवारे और उससे पहले हुए फ़साद को नज़र में रखते हुए एक किताब Hindu Muslim Accord लिखी जिसमें हिन्दुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब पर रौशनी डाली गई।

1952 में डॉ सैयद महमुद पुर्वी चम्पारण से चुन कर लोकसभा गए और फिर 1957 मे गोपालगंज से चुनाव जीत कर सांसद बने।

7 दिसम्बर 1954 से 17 अप्रील 1957 तक डॉ सैयद महमुद विदेश मामले के लिए उप यूनियन मिनिस्टर का कार्य भार संभाला पर आंख की ख़राबी की वजह कर कार्यकाल पुरा नही कर सके अौर इस्तिफ़ा दे दिया। इस दौरान उन्होने ख़ाड़ी के देशों से, मिस्र से, ईरान से भारत के मज़बुत रिशते बनाने मे महत्वपुर्ण भुमिका निभाई।

साथ ही 18–24 अप्रील 1955 में हुए इतिहासिक Bandung Conference में भारत की जानिब से हिस्सा लिया, जिसमे पहली बार अफ़्रीक़ा और एशिया के देशो के बीच बड़े पैमाने पर कई मुद्दो पर बात हुई।

28 सितम्बर 1971 को डॉ सैयद महमुद का इंतक़ाल 82 साल की उम्र में हुआ।

Md Umar Ashraf