ध्रुव गुप्त

प्रेम, विरह, सौंदर्य और ज़िन्दगी की तल्खियों के गायक, उर्दू के महानतम आधुनिक शायरों में एक मरहूम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ गोरखपुरी उर्दू शायरी में नई परंपरा की बुनियाद रखने वाले शायरों में एक थे। जिस दौर में उन्होंने लिखना शुरू किया, उस दौर की शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बंधा था। समय की सच्चाई और लोकजीवन के विविध रंग उसमें लगभग अनुपस्थित रहे थे।

नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली की तरह उन्होंने इस रिवायत को तोड़कर शायरी को नए मसलों, नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा।

उनके लफ़्ज़ों में सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर ढला है। रूमान के साथ ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों और आने वाले कल के प्रति उम्मीद को भारतीय संस्कृति और प्रतीकों से जोड़कर फिराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। पुण्यतिथि (3 मार्च) पर फ़िराक़ की स्मृतियों और उनकी शायरी को नमन, उनके कुछ अशआर के साथ !

शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो

ये सुकूत-ए-नाज़, ये दिल की रगों का टूटना
ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो

निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परीशां, दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म
सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो

कूछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फ़िज़ा, कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो

जिसकी फ़ुरक़त ने पलट दी इश्क़ की काया फ़िराक़
आज उसी ईसा नफ़स दमसाज़ की बातें करो

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।