प्रथम विश्व विश्व युद्ध के दौरान 17 नवम्बर 1917 से 30 दिसम्बर 1917 तक चली जंग में ग्रेट ब्रिटेन ने जहां आस्ट्रेलिया, भारत और न्युज़ीलैंड के सिपाहीयों की मदद से 9 दिसम्बर सन 1917 को अपने 18000 सिपाहीयों को खो कर उस्मानी सलतनत के 25000 सिपाहीयों को मार कर फ़लस्तीन में मौजुद सबसे महत्वपुर्ण शहर अल-कुदुस (येरुशलम) को जीत लिया था; जहां उस्मानी सलतनत के साथ जर्मनी के सिपाही लड़ रहे थे।सलीबयों के हमले के बाद अल-कुदुस (येरुशलम) 9 दिसम्बर 1917 को पहली बार किसी गैर-मुस्लिम के हांथ मे गया था।

इस पर आधिकारिक मोहर उस समय लग गया जब ब्रिटिश सेना का सेनानायक जेनेरल ऐलेनबे अपने फ़्रंच, अमरीकी और ईटालियन फ़ौज के कमांडर के साथ दोपहर 1 बजे 11 दिसम्बर 1917 को Jaffa Gate से अल-कुदुस (येरुशलम) में पैदल दाख़िल हुआ; जहां उसका भारत, इंगलैंड, फ़्रांस, अास्ट्रेलिया, वेल्स, न्युज़ीलैंड, स्कॉटलैंड, आयरलैंड, इटली के सिपाहीयों ने स्वागत किया।

जेनेरल एलेनबे कई सौ साल बाद पहला ईसाई शख़्स था जिसने अल-कुदस यानी येरुशलम पर अपना अधिकार स्थापित किया था।

फ़लस्तीन पर ब्रिटिश सैनिकों का अधिकार इस लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह उस समय के ब्रिटिश विदेश मंत्री बेलफ़ोर के घोषणा पत्र का एक हिस्सा समझा गया जो एक महीने पहले ही जारी हुआ था। इस घोषणा पत्र में ब्रिटिश विदेश मंत्री ने फ़लस्तीन में ज़ायोनी देश(इस्राईल) बनाने का वादा किया था और इस क्षेत्र पर ब्रिटेन के अधिकार से इस वादे के पुरे होने का चांस बढ़ गया था।

11 दिसम्बर 1917 को न्युयार्क हेरालड ने अल-कुद्स (येरुशलम) की जंग के ख़ात्मे की ख़बर को अपने फ़्रंट पेज पर “Jerusalem is rescued by British after 673 Years of Moslem Rule” लिख कर शाय की थी।

वहीं युनाईटेड किंगडम के प्रधानमंत्री डैविड लॉयड जार्ज ने अल-कुदस (येरुशलम) के क़ब्जे को “अंग्रेज़ो को मिले क्रिसमस का तोहफ़ा कह कर ख़िताब किया”

इस जंग ने जहां इंगलैंड के मोरल को बुस्ट कर दिया वहीं उस्मानीयों के कमर को पुरी तरह तोड़ दिया था।

अंग्रेज़ों ने अगले वर्ष 1918 के अक्तूबर महीने में दोनों पक्षों के बीच युद्ध रोकने और शांति के समझौते पर हस्ताक्षर होने तक मध्यपूर्व के अधिकांश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।