प्यूष मिश्र

आज सोशल मीडिया में जिन्ना का जिन्न ट्रेंड कर रहा है और मैं आपसे बिहार के पहले मुख्यमंत्री(प्रीमियर) मो. युनूस का जिक्र करना चाह रहा हूं. क्योंकि आज उनका जन्मदिन है. जी हां, बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह नहीं, मो. युनूस हैं और आज बिहार सरकार उनकी जयंती राजकीय समारोह के साथ मना रही है.

यह 1937 की बात है जब वे बिहार के प्रीमियर बने थे, उन दिनों मुख्यमंत्री को प्रीमियर ही कहा जाता था. यह पद श्रीकृष्ण सिंह को ही मिलना था. क्योंकि उस पहले चुनाव में जब ब्रिटिश सरकार ने हमें स्वशासन का अधिकार दिया था, तब कांग्रेस और मो. युनूस की पार्टी मुसलिम इंडिपेंडेंट पार्टी(एमआईपी) गठबंधन बना कर लड़ी थी और इन दोनों ने मिलकर मुसलिम लीग का सूपड़ा साफ कर दिया था.

इस चुनाव में मुसलमानों के लिए 40 सीटें रिजर्व थीं, जिनमें एमआईपी को बीस सीटें मिलीं, कांग्रेस को पांच और मुसलिम लीग को चार. चुनाव से पहले एमआईपी को मुसलिम लीग का खुला ऑफर था, मगर एमआईपी ने राष्ट्रवादी कांग्रेसियों को ही चुना. मगर जब चुनाव के नतीजे आ गये तो कांग्रेस ने राज्यपाल के अधिकारों को लेकर सरकार बनाने से इनकार कर दिया. तब दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते एमआईपी ने सरकार बनाने का फैसला किया. मो. युनूस का कहना था कि वे मुसलिम लीग को सरकार बनाने का मौका नहीं देना चाहते थे.

हालांकि उनके इस फैसले का कांग्रेस ने खुलकर विरोध किया और कहा जाता है कि जयप्रकाश नारायण ने तो उनके बंगले पर जाकर हंगामा भी किया. मगर युनूस ने कहा कि वे सरकार बनायेंगे और जिस रोज कांग्रेस सरकार बनाना चाहेगी वे कुरसी छोड़ देंगे. उनकी सरकार में सिर्फ मुसलिम ही मंत्री नहीं थे. चार मंत्रियों के मंत्रिमंडल में दो हिंदू थे. उन्होंने जगजीवन राम को भी मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्योता दिया था. मगर जगजीवन राम ने इस ऑफर को ठुकरा दिया.

कहते हैं कि 120 दिनों की मो. युनूस सरकार ने किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण काम किये, जिसमें कर्ज से राहत देने और सिंचाई की व्यवस्था से जुड़े कदम उठाये गये. उन्होंने अपने उस वादे की लाज रखी कि जिस रोज कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तैयार होगी वे कुरसी छोड़ देंगे. जुलाई में जब कांग्रेस ने सरकार बनाने का फैसला किया उन्होंने पद त्याग कर दिया.

सर्चलाइट प्रेस, ओरिएंट बैंक ऑफ इंडिया, पटना फ्लाइंग क्लब जैसी संस्थाओं के संस्थापक मो. युनूस आज बिहार की राजनीति में किसी अजनबी की तरह हैं. दरअसल एक वक्त में बिहार की राजनीति में राष्ट्रवादी मुसलमानों की बड़ी तादाद हुआ करती थी, मगर आज हमनें ऐसे लोगों को भुला दिया. अगर हम ऐसे लोगों को याद रखते तो आज हालात अलग होते…