Shubhneet Kaushik

इलाहाबाद में चौक स्थित भारती भवन लाइब्रेरी का अपना गौरवशाली अतीत रहा है। नवंबर 1889 में ब्रजमोहन भल्ला, ‘हिंदी प्रदीप’ के यशस्वी संपादक बालकृष्ण भट्ट और पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से भारती भवन लाइब्रेरी की स्थापना हुई। साहित्यप्रेमी और हिंदी की उन्नति के लिए समर्पित रहे ब्रजमोहन लाल भल्ला (1872-1902) तब महज 17 वर्ष के थे। महज तीस वर्ष की आयु में मई 1902 में असामयिक मृत्यु होने तक ब्रजमोहन भल्ला ने लाइब्रेरी की व्यवस्था को बखूबी संभाला।

जहाँ एक ओर लाला रामचरण दास द्वारा दी गई आर्थिक सहायता से लाइब्रेरी का सुंदर भवन बना। वहीं इलाहाबाद के गवर्नमेंट हाई स्कूल में संस्कृत के प्राध्यापक रहे जयगोविंद मालवीय जैसे योग्य विद्वानों ने संस्कृत पुस्तकों के अपने निजी संग्रह से लाइब्रेरी को दुर्लभ किताबें और पांडुलिपियाँ देकर उसके संकलन को समृद्ध किया। मदन मोहन मालवीय आजीवन भारती भवन के ट्रस्टी रहे।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारती भवन राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा। जेल में बंद राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी भारती भवन से किताबें मंगाया करते। भारती भवन लाइब्रेरी में हिंदी व संस्कृत की पुस्तकों के साथ-साथ उर्दू व अँग्रेजी की भी किताबें उपलब्ध हैं। साथ ही, यहाँ नागरी प्रचारिणी पत्रिका, माधुरी, विशाल भारत, वीणा, सरस्वती, विज्ञान, सम्मेलन पत्रिका, कल्याण जैसी ऐतिहासिक महत्त्व की पत्रिकाओं की फाइलें भी उपलब्ध हैं।

वर्ष 1995 में डाक विभाग ने भारती भवन लाइब्रेरी के योगदान को याद करते हुए एक डाक टिकट जारी किया। डाक टिकट के साथ तैयार किए गए ‘प्रथम दिवस आवरण’ में एक सुंदर स्केच में भारती भवन लाइब्रेरी के हाल में लोगों को किताबें, पत्रिकाएँ और अख़बार पढ़ते हुए दिखाया गया।

प्रसिद्ध कवि अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा ने भारती भवन लाइब्रेरी पर एक सुंदर कविता भी लिखी है। जिसमें उन्होंने बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारती भवन आने वाले पाठकों की विविधता के बारे में लिखा है। वे इस कविता में 1923 के एक दिन की कल्पना करते हैं, जब लाइब्रेरी हाल में बैठकर कोई दुकानदार, छात्र, क्लर्क, किरानी अख़बार के पन्ने पलट रहे हैं, कोई उर्दू का जासूसी उपन्यास पढ़ रहा है, या कोई इटावा से छपी गोल्डस्मिथ की कविता का हिंदी अनुवाद पढ़ रहा है।

फिर वे वर्तमान पर लौटते हैं, पाठकों की नई पीढ़ी कुर्सियों पर बैठे हुए अख़बार के पन्ने पलट रही है। वे कैम्ब्रिज से आई एक शोधार्थी का ज़िक्र करते हैं, जो इसी लाइब्रेरी में बैठकर औपनिवेशिक काल में भारतीयों के पढ़ने की आदतों का इतिहास लिख रही है। वहीं बाहर के सब्जी मार्केट में एक शख़्स छुरियों पर धार लगा रहा है।