अशोक पुणियां

4 जुलाई 1904 को पैदा हुए अमर शहीद क्रांतिकारी भाई भगवतीचरण वोहरा की क्रांतिकारी आंदोलन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। घर में पत्नी के होते हुए भी वे क्रांतिकारी आंदोलन में कूद पड़े, इतना ही नहीं उन्होंने अपनी पत्नी को भी आज़ादी की लड़ाई की आग में झोंक दिया। इनकी पत्नी का नाम दुर्गादेवी था। जो दुर्गा भाभी के नाम से प्रसिध्द हुई।

भगवती भाई ने एफ.सी. कालेज लाहौर से साईंस में इण्टर किया था, उसके बाद 1921 के असहयोग आंदोलन में कालेज छोङ दिया था। और बाद में पंजाब नेशनल कालेज से भगत सिंह जी और सूखदेव जी के साथ बी.ए. पास किया। यहीं से इन सब ने क्रांतिकारी लङाई में भाग लिया। भगवती भाई जोखिम के कामों में हमेशा आगे रहे। इनके दिल में ब्रिटिश साम्राज्य को दफनाकर भारत को आज़ाद करने की प्रबल इच्छा थी। इतना ही नहीं बल्कि भारत को आजाद कराकर मजदूर किसानों की समाजवादी सरकार की स्थापना करना भी उनका ध्येय था।

1921 का असहयोग आंदोलन गांधी के वापस लेने के बाद जनता निराश हो गई मगर ये क्रांतिकारी चुप कहाँ बैठने वाले थे। और इन सब ने मिलकर सशस्त्र क्रांति का रुख किया।

लाहौर में 13 मार्च 1926 को ‘ नौजवान भारत सभा की स्थापना की गई। जिसमे भगवती भाई, भगत सिंह जी, सूखदेव जी और यशपाल जी महत्वपूर्ण कार्य किये।

भगवती भाई प्रचार मंत्री के रुप में दल को मज़बूत करने में लगे रहे। भगवती भाई दल की रुपयोँ से हर वक्त मदद करते थे। उनकी अनुपस्थिति मेँ दुर्गा भाभी बिना कुछ सवाल किये दल को आर्थिक रुप से मदद दिया करती थी। इस दौरान भगवती कुछ समय कोलकाता रहे।

भगवती भाई की शहादत 28 मई 1930 को भगत सिंह जी और सारे साथियों को जेल से छुड़ाने के लिये बनाये गये बम का परिक्षण करते वक्त रावी नदी के पास जंगलों में बम के हाथ में ही फटने से भगवती भाई शहीद हो गये।और प्रत्यक्षदर्शी क्रांतिकारी साथी वैशम्पायन के अनुसार भगवती भाई अंत में कहकर गये अच्छा हुआ ये बम ने मुझे घायल किया यदि कोई और घायल होता तो कलंक मुझ पर लगता। अब तो कुछ लोगों को मेरे देश भक्त होने में शंका करने की कोई गुंजाइश नही रही और कहाँ तूम्हारी भाभी और भतीजे का ख्याल रखना और भैया (चंद्रशेखर आजाद जी) से कहना मेरे मरने के कारण ये योजना रोके नही।

“भगत सिंह को छुङाने में सहयोग न दे सकूंगा ये दु:ख हमेशा रहेगा काश मृत्यु दो दिन बाद होती”

ये खबर जब घर जाकर दुर्गा भाभी को दी तो वे आँख मूंदकर गिर पड़ीं। भगवती भाई के शव को पत्थर से बांधकर रावी नदी में बहा दिया गया।

भाई भगवतचरण जी हमेशा कहते थे मेरी मृत्यु ऐसी जगह हो और ऐसी मृत्यु चाहता हूँ जिसे कोई ना जाने, मेरी मृत्यु पर न कोई आंसू बहाये और न कोई प्रशंसा के गीत गाये

अमर शहीद क्रांतिकारी भगवती भाई के सहासिक कार्यों को इतिहास कभी नहीँ भूल सकता है। इनका सम्मान तब बढ़ेगा जब देश में शोषण विहीन समाज की स्थापना कि जाये।