1908 में मलेरकोटला पंजाब के एक राज-परिवार में पैदा हुई बेगम एज़ाज़ रसुल एकलौती मुस्लिम महीला है, जो संविधान सभा की सदस्य थीं, उनकी शादी अवध के सण्डीला क़स्बा के ज़मीनदार नवाब एज़ाज़ रसुल से हुई, जिन्होने सियासत में हिस्सा लेने के लिए 1935 के बाद मुस्लिम लीग का रुख किया। 1937 में हुए चुनाव में बेगम एज़ाज़ रसुल उन चुनिंदा महीलाओं में से थी बिना रिज़र्नेशन के चुनाव जीत कर यूपी लेजिस्लेटिव असेंबली के लिए निर्वाचित हुई, और 1952 तक इस पद पर बनी रहीं। 1937 से 40 के दरमियान वो कौंसिल की उप राष्ट्रापति रहीं और 1950 से 52 तक नेता प्रतिपक्ष के रूप में काम किया। वो भीरत की पहली महिला थीं जो इस मुक़ाम पर पहुंची। एक ज़मीनदार ख़ानदान से तालुक़ रखने के बावजूद उन्होने ज़मीनदारी के ख़ात्मे की वकालत की.

साथ ही बेगम ऐज़ाज़ रसूल पृथक निर्वाचिका की माँग को आत्मघाती बताया। उनका विचार था कि यह अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से पृथक्र कर देगी। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और बेगम एज़ाज़ रसुल की कोशिश की वजह कर 1949 ई० तक संविधान सभा के अधिकांश मुस्लिम सदस्य यह स्वीकार करने लगे थे कि पृथक् निर्वाचिका का प्रस्ताव अल्पसंख्यकों के हितों के विरुद्ध था। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मुसलमानों को पृथक् निर्वाचिका की माँग की अपेक्षा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से योगदान देना चाहिए।

बेगम एज़ाज़ रसूल 1946 में संविधान सभा की सदस्य बनीं। बेगम एज़ाज़ रसुल उन 28 मुस्लिम लीग के सदस्यों में से एक थी जो संविधान सभा में शामिल हुए। वो भारत की पहली मुस्लिम महिला थीं जो संविधान सभा की सदस्य बनीं। वो मुस्लिम लीग के डेलिगेशन और संविधान सभा विपक्ष की उपअध्यक्ष थीं। जिसे चौधरी ख़लीक़ुज़्ज़मां लीड कर रहे थे। जब ख़लीक़ुज़्ज़मां पाकिस्तान चले गए तो बेगम एज़ाज़ रसुल ने मुस्लिम लीग को लीड किया। और माईनारिटी राईट ड्राफ़्टिंग सबकमिटी की सदस्य बनीं।

1950 में मुस्लिम लीग का भारत में विलय हो गया और बेगम एज़ाज़ रसुल ने कांग्रेस की सदस्यता ली, और 1952 में राजसभा की सदस्य बनीं। फिर 1969 से 1990 के बीच में वो उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य चुनी गई। और 1969 से 1971 तक अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहीं और भारत सरकार ने बेगम एज़ाज़ रसूल को उनके द्वारा किये गए सामाजिक कार्य के लिए साल 2000 में पद्म भुषण से नवाजा़ गया। इसके इलावा वो 20 सालो तक भारतीय महिला हॉकी फ़ेड्रेशन की अध्यक्ष रहीं और साथ ही एशिया महिला हॉकी फ़ेड्रेशन की भी अध्यक्षता की। बेगम के सम्मान में भारतीय महिला हॉकी कप का नाम उनके नाम पर रखा गया था।

घूमने फिरने में यक़ीन रखने वाली बेगम एज़ाज़ रसुल 1953 की में उस डेलिगेशन का हिस्सा बनीं जो प्रधानमंत्री के जापान दौरे पर गया। और भारतीय संसदये डेलिगेशन का हिस्सा बन 1955 में तुर्की के दौरे पर गईं। इसके साथ ही उन्होने लिखने पढ़ने पर भी ध्यान दिया और “थ्री वीक्स इन जापान” नाम की किताब लिखी और इसके इलावा कई अख़बार और मैगज़ीन को भी अपनी सेवाएं दी, उनके लिए लगातार लिखती रहीं, उनकी ख़ुदनविश्त यानी ऑटोबायोग्राफ़ी बहुत मशहूर हुई, जिसका नाम “पर्दा टू पार्लियामेंट : अ मुस्लिम वोमेन इन इंडियन पालिटिक्स” है. बेगम एज़ाज़ रसूल का इंतक़ाल सन 2001 मे 93 साल की उम्र में हुआ।