वो दौर 1930 का था जब बेगम हसन इमाम अपने शौहर के कंधे से कंधा मिला कर अंग्रेज़ो की मुख़ाल्फ़त कर रही थीं और इनका साथ दे रही थी ‘मिस सामी’ जो हसन इमाम की साहेबज़ादी(बेटी) थीं.

हसन इमाम 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गए और पटना में गठित स्वदेशी लीग के सचिव चुने गए। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और खादी के इस्तेमाल के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया।

इससे पहले वे 1927 में बिहार में साइमन कमीशन के बहिष्कार की सफलता के वास्तविक सूत्रधार थे। हसन इमाम विशेष रूप से सामाजिक सुधारों, महिलाओं और दलित वर्गों की स्थिति की सुधार की वकालत करते थे।

‘मिस सामी’ जो हसन इमाम की बेटी थीं के क़यादत मे मिस सी.जी.दास, मिस गौरी और बिहार की कई औरतों ने मिल कर 15 जुलाई 1930 को एक औरतो के आंदोलन का आग़ाज़ किया जिसके तहत औरतों को विदेशी सीमान के बाईकाट करने के लिए प्रेरित करना था. उस समय बेगम हसन इमाम ने पटना मे सटुडेंट के साथ कई मिटिंग की और पटना शहर से 65 की.मी. दुर स्थित बाढ़ शहर के कांग्रेस मैदान मे एक अज़ीमुश्शान जलसा को ख़िताब किया. ये लोग सड़को पर निकल कर घर घर जाकर लोगो को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और खादी के इस्तेमाल के लिए लोगो को जागुरक करने लगीं.

इस आंदोलन का असर हफ़्ते भर मे दिखने लगा 25 जुलाई 1930 को पटना शहर औरतों के दो अज़ीमुश्शान जलसे का गवाह बना. इन जलसो मे हज़ारो की तादाद मे औरतों ने हिस्सा लिया.

उधर मुंगेर मे इस आंदोलन के कामयाब बनाने के लिए शाह मोहम्मद ज़ुबैर की पत्नी भी इस आंदोलन मे कुद पड़ीं और एक जनता के सेवक के रुप मे उन्होने इस काम को और आगे बढ़ाया था 25 जुलाई 1930 को उन्होने मुंगेर मे एक बड़े जलसे को ख़िताब किया. इसके बाद उन्होने एक कमीटी तशकील की जिसके तहत विदेशी सीमान के बाईकाट करने के साथ साथ लोगो को स्वादेशी सामान ख़रीदने के लिए जागरुक किया जा सके.

ये मिस सी.जी.दास, मिस गौरी, मिस सामी और बेगम हसन इमाम की मेहनत का नतिजा था पर बिहार मे हुए महीलाओ के इस आंदोलन से अंग्रेज़ पुरी तरह बौखला गए इस लिए उन्होने आंदोलन को ग़ैरक़ानुनी मानते हुए तमाम इन औरतों पर सेकशन-10 पुलिस एक्ट और 143IPC के तहत मुक़दमा दर्ज होता है. अदालत ने बेगम हसन इमाम पर 200रु का जुर्माना आएद किया और बाक़ी तमाम औरतों पर 100रु जुर्माना आएद किया और जुर्माना नही अदा करने पर 6 माह की क़ैद की सज़ा सुना दी.

This photograph was taken in Europe around 1924 and shows Syed Hasan Imam, his wife Natalia (nee Saupin) and son Tootoo. (Photo :Bulu Imam)

बेगम हसन इमाम ने जज के सामने खुले तौर पर कह दिया की :- “हममे से कोई भी जुर्माना नही अदा करेगा और अगर जज साहेब ये समझते हैं की अंग्रेज़ी क़ानुन इतना ही मज़बुत है की कोई पैसा दे कर छुट जाए तो हमे आज़ाद कर दीजिए.”

इन मुक़दमात से बरी होने के बाद मिस गौरी, मिस सामी और बेगम हसन इमाम हज़ारीबाग़ और उसके आस पास के ज़िले के दौरे पर निकल गईं और औरतों को प्रेरित करने लगीं.

30 जुलाई से 1 अगस्त 1930 को मुम्बई मे कांग्रेस की वर्कींग कमीटी ने एक रिज़ुलुशन पास कर इन तमाम औरतों की हौसला अफ़ज़ाई की.

बेगम हसन इमाम इसके बाद मुज़फ़्फ़रपुर को निकल गईं और यहां औरतो की एक कमीटी तशकील की जिसका काम जगरुकता फैलाना था. 5 अगस्त को इन्होने गया शहर मे एक जलसा को ख़िताब किया और सरकारी मुलाज़िम और मुंसिपल औरथोरेटीज़ को अड़े हांथ लेते हुए इनके ग़ैर ज़िम्मेदाराना हरकत की खुल कर निंदा की.