एस डी ओझा

बड़े गुलाम अली खां का डील डौल देखकर कोई भी उन्हें पहली नजर में पहलवान ही सोचता , गायक तो कत्तई नहीं। वे जब गाते तो बड़ी शिद्दत से गाते थे। कोई हड़बड़ी नहीं , कोई जल्दी बाजी नहीं। गायन शुरू करते तो घंटों गाते चले जाते। एक बार उनके पास पंडित नेहरू का फोन आया। पंडित जी चाह रहे थे कि वे उनके साथ सिर्फ एक घंटे बैठे और अपने गायन से उन्हें आप्लावित करें। पंडित नेहरू उनके साथ सिर्फ एक घंटा हीं व्यतीत करना चाहते थे , जो कि बड़े गुलाम अली खां को गंवारा नहीं था। वे चाहते थे कि पंडित जी उनके साथ बैठें तो घंटों उनका गायन सुनें। बड़े गुलाम अली खां ने विनम्रता पूर्वक पंडित नेहरू के इस प्रस्ताव को यह कहकर नकार दिया कि एक घंटे तो उनके गले को गरम होने के लिए हीं चाहिए।

बड़े गुलाम अली खां ने अपना कैरियर सारंगी वादन से शुरू किया था। बाद में उन्होंने अपने पिता अली बख्श और चाचा काले खां से गायन सीखा। सन् 1919 में उन्होंने लाहौर में अपना पहला प्रदर्शन किया था। इसके बाद कोलकाता और इलाहाबाद में भी अपने गायन का प्रदर्शन किया था। इन संगीत सम्मेलनों ने उन्हें अपार ख्याति प्रदान की। बड़े गुलाम अली खां ने ठुमरी को एक विशेष दायरे से निकाल कर उसे व्यापक क्षेत्र प्रदान किया। ठुमरी उनके लोचदार और मधुर आवाज को पाकर धन्य हो गयी थी। उन दिनों फिल्मों में गाना अच्छा नहीं माना जाता था। जब के आसिफ मुगल- ए – आजम फिल्म में गाने का प्रस्ताव लेकर उनके पास पहुंचे तो टरकाने की गरज से बड़े गुलाम अली खां ने उनसे एक गाने की 25,000/- की रकम मांग ली। उन दिनों 25,000 /- की रकम बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी । लता व रफी को एक गाने के एवज में महज 500/- हीं मिलते थे। आश्चर्य की बात तब हुई जब के आसिफ ने उनके इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। बड़े गुलाम अली खां ने मुगल – ए – आजम के लिए दो गाने गाए थे।” प्रेम जोगन बन के” और “शुभ दिन आयो राज दुलारा “।

बड़े गुलाम अली खां का जन्म 02 अप्रैल 1902 को लाहौर के निकट कसूर गांव में हुआ था। उनकी जिंदगी लाहौर , मुम्बई , कोलकाता और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में घुमते हुए बशर हुई। उनके पिता कश्मीर के राज दरबारी गायक थे। उनकी गायिकी कश्मीर घराने की कही जाती थी। बाद के दिनों में उनका पूरा परिवार पटियाला आ गया तो उनका घराना पटियाला घराना कहलाने लगा । बड़े गुलाम अली खां का गाया भजन ” राधे श्याम बोल ” महात्मा गांधी को अति हीं प्रिय था।

1947 में भारत विभाजन के दौर में बड़े गुलाम अली खां पाकिस्तान चले गये थे , किन्तु वहां उनका मन नहीं लगा। उन्हें पुनः भारत आना पड़ा। मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें रोकने की भरपूर कोशिश की , पर बड़े गुलाम अली खां के लिए पाकिस्तान बेगाना हो गया था।

बड़े गुलाम अली खां के शागिर्द आज के शानदार गजल गायक गुलाम अली भी थे। भारत सरकार ने बड़े गुलाम अली खां के गायन क्षेत्र में अपना सर्वस्व देने की एवज में 1962 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा था। उनके नाम पर भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया था। आज हीं के दिन (23 अप्रैल ) 1968 को यह अलबेला गायक चिरनिंद्रा में सो गया था।