कभी इक़बाल ने कहा था :

ये नुक़ता सरगुज़शते मिल्लत ए बैज़ा से है पैदा,
के अक़वामे ज़मीन ए ऐशिया का पासबां तु है।

इस शेर का मतलब जो भी हो पर मै बात करने जा रहा हुं ऐशियावाद का जिसने ज़ेहनी तौर पर ऐशिया को जोड़ कर रखा था।

जब 1904 – 1905 के दौरान जापान और रुस मे जंग हुई तो ज़ेहनी तौर पर ऐशिया के मुल्कों ने जापान का साथ दिया और जब जापान ने फ़तह हासिल की तो कई ऐशियाई मुल्कों ने जापानीयों की हौसला अफ़ज़ाई के लिए बजा़ब्ते एक डेलीगेशन भेजा था।

एैसी ही एक डेलीगेशन 1897 मे हुए उस्मानी-युनानी जंग में उस्मानी फ़ौज के फ़तह के बाद हिन्दुस्तान के जानिब से सलतनत उस्मानीया (तुर्की) की राजधानी इस्तांबुल (क़ुस्तुन्तुनीया) उस्मानी फ़ौज की हौसला अफ़ज़ाई और मुबारकबाद देने पहुंचा था।

रुस-उस्मानी जंग मे भी ऐशिया वालो ने सलतनत उस्मानीया का साथ दिया था। इस दौरान हिन्दुस्तान के सुदूर इलाक़ों तक लोगों नें चंदा इकट्ठा कर उस्मानी सलतनत की मदद की थी; यहां चंदा देने वालों में मुसलमान के साथ अमीर हिन्दु भी थे।

इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी ने तो 1911-12 मे हुए बालकन युद्ध मे सलतनत उस्मानिया के समर्थन मे मेडिकल टीम की नुमाईंदगी की थी जिसमे उनके साथी थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर जो ख़ुद इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं और इनके साथ दीगर नौजवान रज़ाकार भी थे, जो काफ़ी रईस घरानो से तालुक़ रखते थे। और इनमे अधिकतर इंगलैंड मे ज़ेर ए तालीम थे।

और हां, बालकन वार के समय उस्मानी तुर्को की मेडिकल मदद के लिए रेड क्रिसेंट सोसाईटी को पहली क़िस्त मे मदद के तौर पर जो रक़म हिन्दुस्तानीयों ने भेजी थी वो 185000 ओटमन लीरा थी, और इस रक़म को जमा करने के लिए औरतो ने अपने गहने तक बेच डाले थे। ग़ौर करने वाली बात यह है के उस समय हिन्दुस्तानी ख़ुद अंग्रेज़ों के ज़ुल्म का शिकार थे और आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे।

अब आते हैं अब को हालात पर…. हमारे (ऐशिया) अंदर अजीब क़िस्म की क़ौमियत (राष्ट्रावाद) घुस चुकी है. हम अपनी लड़ाई मे दुसरे को बहुत जल्दी इंनवाल्व कर लेते हैं.. हम (भारत) लड़ते हैं पाकिस्तान से, चीन से और हथियार ख़रीदते हैं अमेरिका से, रुस से, फ़्रांस से। हम (द. कोरिया – जापान) लड़ते हैं उत्तर कोरिया से और हंथियार ख़रीदते हैं अमेरिका से। हम (साऊदी अरब) लड़ते हैं ईरान से और हंथियार ख़रीदते हैं अमेरिका से, रुस से, फ़्रांस से, ब्रीटेन से, और न जाने कहां कहां से। ज़रुरत पड़ने पर हम बाहरी मदद लेने से भी गुरेज़ नही करते हैं, हमने ( क़ुवैत ने ) ईराक़ को कुटवाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन तक को बुलवा लिया। सीरिया में अमेरिका और रुस को दावत किसने दी ? हमने (तुर्की, साऊदी अरब, ईरान)। और इन सबके बीच पिस कौन रहा ? हम (ऐशिया वाले)।

हर बीस कोस के दूरी पर एक अलग मुल्क रखने वाले यौरप के अदना से पियादे पर उंगली तो उठा कर देखीये, सारे के सारे मुल्क एैकटिव हो जाएंगे। ग्रीस मे आई हुई मंदी इसका एक छोटा सा नमुना है। वर्ना 25 साल पहले आपने बोसनिया की जंग को भी देखा है। और हम “नेपाल” जैसे साझा विरासत रखने वाले मुल्क को नानी याद दिलाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। हमारे यहां “नाटो” द्वारा अफ़गानिस्तान पर बम्बारी करवाने के लिए अपने अपने हवाई पट्टी देने के लिए होड़ लग जाती है। और लाखो को मरवा कर आगे की प्लानिंग मे लग जाते हैं. पर कभी ये नही सोचते हैं के अगला नम्बर हमारा भी हो सकता है।

अगर आपने चीन के Boxer Rebellion के बारे मे पढ़ा होगा तब जानते होंगे किस तरह यौरप के मुल्को ने मिल कर चीन को कुट दिया था; वो भी जापान की मदद से। इन मुल्को मे ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, रुस, फ़्रांस, आस्ट्रीया-हंगरी और अमेरीका का नाम नुमाया है. इसमे ब्रिटेन की जानिब से लड़ने वाले तीन हज़ार सिपाही हिन्दुस्तानी ही थे। और अब यही सब तो “नाटो” द्वारा अफ़गानिस्तान मे कुछ ऐशियाई मुल्कों की मदद से किया जा रहा है।

आए दिन यौरप और अमेरिका मे ऐशियाई लोगों पर नस्ली हमले हो रहे हैं। हमें ख़बर तब ही मिलता है जब किसी भारतीय पर हमले होते हैं वर्ना बाक़ी के ऐशियाई मुल्कों की ख़बर हम तक पहुंच भी नही पाती है़. और ग़लती से एकाध यौरप के लोगों को ऐशिया के किसी मुल्क मे ख़राश भी आ जाए फ़ौरन आपको तलब कर लिया जाएगा।

वैसे वो एेशियावाद था ही जिसने राष बिहारी बोस, सुभाष चंद्रा बोस जैसे हज़ारों क्रांतिकारीयों को रास्ता दिखाया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने तीस हज़ार क़ैद में पड़े भारतीय सिपाहीयों का आज़ाद किया; और आज़ाद हिन्द फ़ौज और आज़ाद हिन्द सरकार वजूद में आई।

आज आप लाख ख़ुदको SEATO, SAARC, AAPP, ASEAN जैसी तंज़ीमों से जोड़ ले पर जब तक आपके अंदर Asia For Asian, Pan-Asianism, Asianism, Greater Asianism का जज़्बा नही आएगा आप कुटाते रहोगे। इस लिए तमाम ऐशियाई मुल्कों को मिल कर UNO मे चीन के साथ अब भारत और तुर्की के भी स्थाई सदस्यता (वीटो पॉवर) दिलवाने के लिए जद्दोजेहद करना चाहीये।

बाक़ी अकबर इलाहाबादी ने आपके लिए बिलकुल सही कहा है :

”सर झुका के चल, सीने को न तान
एशिया को शूद्र, और यूरोप को ब्राह्मण जान”

Md Umar Ashraf