ध्रुव गुप्त

पंजाबी की सबसे लोकप्रिय कथाकार, उपन्यासकार और कवियित्री स्व. अमृता प्रीतम देश की उन चंद लेखिकाओं में हैं जिनकी कृतियां स्त्री के प्रेम, उसकी महत्वाकांक्षाओं और उसके संघर्ष के जीवंत दस्तावेज हैं। वहां यथास्थिति और रूढ़ियों के प्रति विद्रोह है, लेकिन इस विद्रोह का स्वर कर्कश नहीं, बेहद शालीन और मुलायम है। अपनी रचनाशीलता के बारे में अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था- ‘मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वह सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी। उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।’ उनके लिए प्रेम में व्यक्तित्व का उत्सर्ग ही देवत्व की प्राप्ति थी। स्वभाव से बेहद रूमानी अमृता प्रीतम अपनी रचनात्मकता के अलावा शायर साहिर लुधियानवी और चित्रकार इमरोज़ के साथ अपने खुले प्रणय संबंधों के कारण भी हमेशा चर्चा में रही। उनकी चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ सहित उनकी सौ से ज्यादा कृतियां पंजाबी और भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। पुण्यतिथि (31 अक्टूबर) पर अमृता जी को भावभीनी श्रद्धांजलि, उनकी एक बेहद प्यारी कविता ‘एक मुलाक़ात’ के साथ !

मैं चुप, शांत और स्थिर खड़ी थी
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था
फिर समुन्द्र को खुदा जाने
क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली-सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर चला गया

मैं बहुत हैरान थी
पर उसका तोहफ़ा ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है
लाखों ख्याल आए
माथे में झिलमिलाये
और मैं उलझन में
खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर
अब अपने शहर कैसे जाऊंगी
मेरे शहर की हर गली संकरी
मेरे शहर की हर छत नीची
मेरे शहर की हर दीवार चुगली

सोचा कि अगर तू कहीं मिले
तो समुन्द्र की तरह
इसे छाती पर रख कर
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे
और नीची छतों और संकरी गलियों
के शहर में बस सकते थे

पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती
और अपनी आग का मैंने
आप ही घूंट पिया
मैं अकेला किनारा
किनारे को गिरा दिया
और जब दिन ढलने को था
समुद्र का तूफान
समुद्र को लौटा दिया

अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है
तूं भी उदास,चुप,शांत और स्थिर
मैं भी उदास,चुप,शांत और स्थिर
सिर्फ दूर बहते समुद्र में तूफान है !

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।