इलाहाबाद शहर के मूल संस्थापक अकबर थे। अकबर की देन से इलाहाबाद आज भी जिंदा है। मैं इलाहाबादियों से पूछता हूँ आज भी गंगा यमुना की बाढ़ से शहर को कौन बचाता है। अगर अकबर का बनवाया बांध न हो तो आज भी इलाहाबाद का अस्तित्व एक बरसात ही है।

जो इलाहाबाद को जानते हैं मैं उनसे पूछता हूँ अकबर के बांध के पहले इलाहाबाद में आबादी की संभावना कैसे रही होगी। कछार के धरातल से भी नीचे है अल्लापुर अलोपीबाग बैरहना और तुलारामबाग टैगोरटाउन का धरातल। सिविललाइंस कटरा और मम्फोर्डगंज का कुछ हिस्सा ऊँचा है। भारद्धाज आश्रम और आनंद भवन के आसपास भी कुछ ऊँचे भूभाग है। यहाँ तब भी मुनियों के आश्रम रहे होंगे। लेकिन आबादी का कहीं कोई जिक्र नहीं है।

इलाहाबाद वालों जो आपको दो महान नदियों की बाढ़ की विभीषिका से बचाता है वह निर्माण हुमायूँ के पुत्र अकबर का है। दारागंज से एलनगंज के बीच लगभग 2 किलोमीटर का बांध। जिसे आप अब केवल बांधरोड कहते हो।

अकबर के पहले के मध्यकाल में उस इलाके में शासन और सत्ता के केन्द्र कड़ा मानिकपुर जौनपुर और चुनार थे। अकबर ने संगम पर एक मजबूत किला बनवाकर कड़ा और कोसम की जगह जंगलों और डूब वाली भूमि पर एक नगर संभव किया।

जिसे भी मेरी इस स्थापना पर आपत्ति हो वह बताए कि बांधों का चौतरफा घेरा जब न था तो गंगा का पानी बघाड़ा वाले कछार से शहर में दाखिल होने से कौन रोकता था।

आप नाम बदलो। हारे हुए लोगों और उनके नगरों के नाम बदले जाने की एक सामंती परम्परा रही आई है। लेकिन अकबर ने काशी, अयोध्या मथुरा हरिद्वार उज्जैन विन्ध्याचल मैहर चित्रकूट इन बड़े तीर्थों के नाम क्यों नहीं बदले? अगर काफिरों को नीचा दिखाना होता तो ये बदलाव व्यापक प्रभाव डालते। रोचक बात है कि किसी नदी का नाम नहीं बदला गया। किसी पहाड़ किसी झरने का नाम नहीं बदला गया। पूरे मुगल सरकार में । गंगा यमुना सरयू चंबल केन बेतवा बरुणा गंडक सोन घाघरा व्यास झेलम रावी सिंध चेनाब सुतलज जंमू तवी किसी नदी नाले का नाम नहीं बदला। हिमालय हरिद्वार से पानी मंगाकर पीता रहा अकबर।

कितने कम दूरंदेश थे मुगल। अकबर तो पूरा मूर्ख था सूर्यसह्रनाम रटने में लगा था। टोडरमल खत्री बीरबल पाण्डे मानसिंह कछवाहा को नवरत्न बनाकर सरकार चलाता रहा। हारे लोगों के भगवान के प्रिय भगवान राम और सीता के नाम पर सिक्के जारी करना यह बताता है कि पराजितों के समूल नाश की मानसिक औकात नहीं थी उसमें। और उसका नवरत्न मानसिंह बरसाने में राधारानी का मंदिर बनवाता रहा। सरकार की नाक के नीचे। और अकबर तानसेन से रागरागिनी सुनता रहा।

तुलसीदास राम का चरित गाते रहे उसके शासन में। सूर की कृष्ण लीला वृंदावन में चलती रही। पूरी भक्ति कविता गाई गई उस अकबर की सरकार में। उसे रोकना होता तो यह साहित्य सृजन रोकना था। उल्टे उसका एक प्रिय सिपहसालार कवि रहीम तो वैष्णव हो गया। पुष्टि मार्ग का अनुयायी। बीस भाषाओं का ग्यानी फारसी तुर्की अरबी संस्कृत का प्रकांड पंडित होकर ब्रज में बरवै और नीति के दोहे रचता रहा।

हारे लोगों की भाषा संस्कृति से प्रेम करने वाले मूर्ख थे सब। रहीम को फारसी से हिलना नहीं था और तुलसी सूर कुम्भन सबको दो थप्पड़ लगा कर आगरे से लेकर अगरोहा तक कहीं कैद रखना एक अपराजेय सम्राट के लिए इतना कठिन काम तो न रहा होगा। उसे जौनपुर में पुल नहीं बनवाना था। बस जौनाशाह की जगह हर नये पुराने निर्माण को अकबर द्वारा तामीर किया गया की मुनादी करवानी थी।

लेकिन तब उसके इंतकाल पर जौनपुर इलाहाबाद मीरजापुर बनारस शोक में न डूबते। यहाँ के बाजार हफ्तों अपने शहंशाह के जाने का मातम न मनाते। आप अकबर के संस्थापित शहर का नाम बदलो। लेकिन जन के मन से खुरचकर अकबर को मिटाने की क्या तरकीब निकालोगे?

बोधिसत्व, मुंबई