हफ़ीज़ किदवई

कोई कहता है की यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था तो कोई कहता है की यह जन संघर्ष की मिसाल है. कोई कहता यह देश में हिन्दू मुस्लिम एकता से उपजा संघर्ष था जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी. कोई इसमें बहादुरशाह ज़फ़र, तात्या टोपे, बेगम हज़रतमहल, पेशवा नाना साहब के मिले जुले संघर्ष के ताप को देखकर पिघल उठता है. मैं मानता हूँ की वाकई 1857 अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम देश का पहला सामूहिक संगठित संघर्ष था. यकीनन इस महान संघर्ष पर काबू पाने में अंग्रेजों को छींके आ गई थीं. देश के बच्चे बच्चे को मालूम होना चाहिए की इस देश का निर्माण जो सन 1857 से 1947 तक के संघर्ष में निकला है,उसमे कौन कौन सी शख्सियतों ने बलिदान दिए हैं. किसने किसने अपना खून बहाकर हमारे इस शानदार देश भारत को सींचा है. यह बड़ी लम्बी फेहरिस्त है, हममे से ज्यादातर रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बहादुर शाह ज़फ़र, मंगल पांडे, पेशवा नाना जी को जानते ही हैं.उनके संघर्षों से कम या ज्यादा परिचित तो हैं हीं मगर इसी क्रांति की बहुत से अग्रदूतों को हम नही जानते.

उनमे से अगर हम बात करें मोलवी अहमद उल्लाह शाह की तो बहुत कम लोग इस नाम से परिचित होंगे. यह वही मौलवी हैं जिन्होंने 1857 क्रांति में सेना से ज्यादा जनता की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया. इनका मानना था की जब जनता विद्रोह करेगी तो अंग्रेजों को ठहरने की कोई जगह नही मिलेगी. मौलवी एक बेहतरीन संगठनकर्ता थे उन्होंने जनता,सेना और इस संघर्ष के महत्वपूर्ण साथियों  के बीच कम्युनिकेशन के लिए कई प्रतीक खोजे. इतिहासकार मैलसन का कहना है की इस क्रांति में चपाती और फूल प्रतीक स्वरुप देने का विचार मौलवी का ही था. चपाती से यह बताना था की संघर्ष में कौन कौन साथ है और शामिल है. मद्रास से चले मौलवी एक ऊँचे सूफ़ी संत के शागिर्द तो थे ही साथ ही खुद महान योद्धा थे. फ़कीरी और वैराग्य ने उनके दिल में जगह बना ली जिससे वह अपने शहर अर्काट नगर को छोडकर उत्तर की तरफ चल दिए. 38 साल की उम्र में ही दिल्ली, पटना, कलकत्ता, मेरठ घूम घूम कर मोलवी ने लखनऊ का रुख किया. जब उनका काफ़िला चलता था उसके साथ झंडा और नक्कारा साथ चलता था, जिससे कुछ लोग उन्हें डंका शाह भी कहा करते. जिस और यह काफ़िला निकल जाता उस और से बहुत से लोग इसमें जुड़ते जाते. मोलवी अहमद उल्लाह शाह जब सन 1854 में लखनऊ पहुचे तो उन्होंने घसियारी मंडी में डेरा डाल दिया और यहीं से अंग्रेज़ों के विरुद्ध महौल बनाने में जुट गए.

जब अंग्रेज़ों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह से शासन की बागडोर लेकर उन्हें मटियाबुर्ज भेज दिया तो इसकी तीखी भत्सर्ना मोलवी ने की, उनकी इस आलोचना और विरोध को अंग्रेज़ बर्दाश्त नही कर सके और उन्हें लखनऊ से बाहर कर दिया गया जहाँ से वह फ़ैज़ाबाद चले गए.  फ़ैज़ाबाद में भी एक ही काम की लोगों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध तैयार करना, आख़िर उन्हें इसके लिए गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया और मृत्यु दंड की सज़ा दी गई.

जनता में उनके प्रति इतना प्रेम था की अंग्रेज़ों ने तत्काल फांसी देने का फैसला रोक लिया और सोचा जब माहौल कुछ हल्का होगा तब फांसी देदी जाए.उसी वक़्त जब सभी सैनिक छाँवनीयों में संघर्ष छिड़ गया था,फैजाबाद की छावनी में भी क्रांति ने दस्तक देदी. मौलवी अहमद उल्लाह शाह को आज़ाद करा लिया गया और अवाम चीख चीखकर उनसे  अवध के तख्त पर बैठने के लिए कहने लगी,जिसे मौलवी ने मजबूती से इनकार कर दिया. उन्होंने साफ़ कह दिया हुकुमत मेरा मकसद नही थी और न है. मैं अपने देश से अँगरेज़ हुकुमत खत्म करके इसकी बागडोर देश के लोगों को सौंपना चाहता हूँ,बस यही एक मकसद है.

मौलवी की आज़ादी की खबर फैजाबाद के अंग्रेजों में फैलगई, जिसका ख़ौफ़ यह था की वहाँ अफरा तफरीह मच गई. मौलवी ने हुक्म दिया की अंग्रेज़ों के बच्चे और औरतों को हाथ न लगाया जाए बल्कि उन्हें हिफ़ाज़त के साथ जाने का बन्दोबस्त हो. किसी को तकलीफ़ नही दी जाएगी बस यह फ़ौरन फ़ैज़ाबाद में शासन छोड़ दें. मौलवी मानवता और नैतिकता में बेहद ऊंचाई तक गए थे, जिसका असर उनके हर फैसले पर दीखता रहा. मौलवी ने फ़ौरन सेना एकत्र की, लोगों में ज़ोरदार भाषण देकर जोश भरा और लखनऊ की तरफ रुख किया. मौलवी का लखनऊ आना हुआ की सभी अँग्रेज़ दुबक कर रेजिडेंसी में छिप गए, जिसके बाहर मौलवी ने डेरा डाल दिया. मौलवी ही थे जिन्होंने बेगम हज़रत महल का साथ देकर बिरजीस कद्र को अवध का नवाब बना दिया. मौलवी लगातार लखनऊ स्थित रेजिडेंसी को घेरे हमला करते रहे. लखनऊ की बागडोर अपने हाथ लेने की आउट्रम और कैम्पबेल की हर कोशिश नाकाम होती रही, उन्हें एक भारी कुमक बुल्वानी पड़ी. नेपाल के राणा जंग बहादुर ने जब अंग्रेजों का साथ दिया तब अँग्रेज़ मजबूती से इन क्रांतिकारियों पर टूट पड़े और फिर लखनऊ से बेगम हज़रत महल अपने बेटे बिरजीस कद्र और पेशवा नाना साहब के संग संघर्ष करती हुई नेपाल की और चली गई और मौलवी अहमद उल्लाह शाह अंग्रेज़ों से बचकर शाहजहांपुर की तरफ निकल गए. शाहजहांपुर पर अंग्रेजों ने आक्रमण कर दिया जिससे मौलवी ने पोबाया के रजा जगन्नाथ सिंह के यहाँ शरण ली. एक रात राजा जगन्नाथ ने मोलवी के साथ विश्वासघात कर सोते में उनकी गर्दन काट ली और अंग्रेज़ों को उपहार स्वरुप भेज दिया जिसकी एवज में अंग्रेज़ों ने राजा  को उस वक़्त पचास ह़जार रूपये इनाम में दिया. इस तरह देश का एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमरत्व में विलीन हुआ.

आज भी उनकी मजार शाहजहांपुर में है. मौलवी अहमद उल्लाह शाह एक बेहतरीन वक्ता, शानदार योद्धा, उच्चकोटि के संगठनकर्ता थे ही साथ ही बेहद मिलनसार भी थे,जो उनके सम्पर्क में आता वह उनका ही हो जाता.मोलवी अंग्रेजी समेत बहुत सी भारतीय भाषाओँ के ज्ञाता तो थे ही साथ ही ऊँचे दर्जे के विद्वान् भी थे. मौलवी  के जिस्म में मुल्क की मोहब्बत कूट कूट कर भरी थी और दिमाग हर वक़्त तैयार था की इसे अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करवाना है. हमे मौलवी से सीखना चाहिए की जब भी ज़ुल्म सर के ऊपर चढकर बोले तो तो संघर्ष से मत घबराओ. यह मत सोचो की मेरे पास तो ताकत ही नही है,ताकत बनाई जाती है,लोग जोड़े जाते हैं और हर जुल्मी को वही तबाह कर सकता है जिसका दिल बेइंसाफी को सहने को तैयार न हो.

1857 का स्वतंत्रता संग्राम ऐसे बहुत से वीरों के संघर्षो से सजा हुआ है. हर एक को पलट कर देखिये तो एहसास होगा की हमारी धरती ने कैसे कैसे वीर जने है. यह ऐसा संघर्ष था जिसमे बच्चे भी शामिल थे तो बूढ़े भी. इसमें हिन्दु भी शामिल था तो बराबर से मुसलमान भी खड़े थे. आदमी संघर्ष कर रहे थे तो औरते नेत्रत्व कर रही थी. देश का एैसा संघर्ष जिसमे सारा फ़र्क मिट चूका था, अँग्रेज़ जानते थे की अगर यह एकता रह गई तो उनका भारत में टिकना नामुमकिन हो जाएगा. इसलिए इसे तोड़ो. अंग्रेजों ने हिन्दू मुसलमान के बिच जहर बोना शुरू किया, उन्हें लडवाना शुरू किया जिससे उनकी राह और आसान हो गई. अगर हम पलट कर 1857 से सीखें तो जान जाएँगे की देश की तरक्की एकता में ही है. आज भी जो हिन्दू और मुसलमान के बिच नफ़रत फैलाते हैंवह अंग्रेजों के ही एजेंट हैं.

अब देशद्रोही की है केवल एक ही पहचान
हिन्दू-मुसलमान एकता से जो है परेशान

सच बात है आज भी जो इन्हें तोड़ने पर लगा है वही तो भारत को कमजोर कर रहा है.जब जब इस देश में हिन्दू मुसलमान ने कंधे से कंधा मिलाया है,दुश्मन थर्राया है.हम सबको इतिहास पलट कर देखना चाहिए. महारानी लक्ष्मीबाई हों, तात्या टोपे हों या फिर पेशवा नानी जी हों. सब ने इस माटी की आज़ादी का संघर्ष किया है. सबने हिन्दू मुसलमान एकता को अपनाकर अंग्रेज़ों के दांत खट्टे किये है. हम सबको मौलवी अहमद उल्लाह शाह का संघर्ष मालूम होना चाहिए ताकी आने वाली नस्लों को यह तो बता सकें की देखो, दुनिया के इस सबसे ख़ूबसुरत मुल्क की नीव में किसका किसका खून बहा है. हम सबको अपने इन सभी शूरवीर सेनानियों की तरह दिल बड़ा रखना चाहिए. ख़ुद को किसी भी कट्टरता से परे रखकर देश को मजबूत करने में जुटना चाहिए. जब सब नागरिक एक होंगे तो पेशवा नानी जी ख़्वाब ही तो पूरा होगा. यह देश ऐसे ही हमेशा एक साथ मिलकर आगे बढ़ेगा. तोड़ने वाले टूट जाएँगे आज नही तो कल..