दिल की धड़कन पे मोहब्बत का फ़साना लिख दो

वस्ल के एक ही लम्हे को ज़माना लिख दो

लिखना कुछ चाहो अगर नाम के आगे मेरे

हज़रते मीर का, ग़ालिब का दिवाना लिख दो

(हाशिम रज़ा जलालपुरी)

 

मशहूर शायर और आलोचक प्रोफेसर यूसुफ हसन फरमाते हैं कि “गालिब ने स्टीम इंजन के दौर में शायरी की, आज रोबोटिक आटोमेशन का ज़माना है, गालिब को आज भी पढ़ा जा रहा है और आइन्दा भी पढ़ा जायेगा”।

 

उर्दू शायेरी में गालिब को वही स्थान हासिल है जो सितारों से भरे आसमान में चाँद को हासिल है। जिस तरह चाँद से अनगिनत सितारे रोशनी हासिल करते हैं उसी तरह मिर्ज़ा गालिब से दुनिया जहान के न जाने कितने शायर, लेखक और दार्शनिक फैज़ हासिल करते हैं। गालिब ने शायेरी के पुराने जिस्म में नई रूह फूँकी। शायेरी की रगों में फलसफा, इंकिलाब और नये नये विषयों की लहरें रवाँ की।

मिर्ज़ा गालिब ज़िन्दगी की यूनिवर्सिटी के होनहार छात्र थे। उन्होंने ज़िन्दगी को अपने तौर पर समझने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने ज़िन्दगी के उतार चढाव को शिद्दत से महसूस किया।  उनके ख्याल और फ़िक्र की बुलंदी का राज़ भी इसी में छुपा है। 

 

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक 

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

 

बादशाहे ग़ज़ल मीर तक़ी मीर मिर्ज़ा गालिब के बारे में कहा कि- “अगर इस लड़के को कोई कामिल उस्ताद मिल गया और उसने इसे सीधे रास्ते पर डाल दिया तो लाजवाब शायर बन जायेगा वरना मोहमल बकने लगेगा”

न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता खुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता

गालिब ने जिस दौर में आँखें खोलीं उस ज़माने में हिंदुस्तान का दिल दिल्ली उजड़ चुकी थी यानी दिल्ली की ग़ज़लें दिल्ली का मर्सिया बन चुकी थीं और हिंदुस्तान पर पूरी तरह अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा हो चुका था। इन घटनाओं ने गालिब की नज़र में गहराई और फ़िक्र में फैलाव पैदा किया। जिसका अक्स उनकी शायरी में जा ब जा दिखाई देता है। 

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद 

फिर यह हंगामा ऐ खुदा क्या है 

 

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

  

गालिब की निजी ज़िन्दगी तल्खियों और महरूमियों से भरी हुयी है। बचपन में बाप की मौत, चचा की परवरिश, फिर उनके साये से महरूमी, 13 साल की कच्ची उम्र में शादी की ज़ंजीर, क़र्ज़ों का बोझ- इन चीज़ों ने गालिब को वह सब कुछ सिखा दिया जो आदमी किसी यूनिवर्सिटी या कालेज में हज़ारों किताबें पढ़ कर भी नहीं सीख पाता।

 

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक्ल में गुज़री ग़ालिब 

हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे

 

मिर्ज़ा ग़ालिब ने यूँ तो शायरी की विभिन्न विधाओं में शायरी की लेकिन ग़ज़ल गोई में उनको वह हैसियत हासिल है जो किसी और के हिस्से में नहीं आई। इस बात का भी ज़िक्र ज़रूरी है कि उन्होंने न सिर्फ उर्दू बल्कि फ़ारसी भाषा में भी शायरी की। खुसरो, बेदिल और नज़ीरी को छोड़ कर ग़ालिब फ़ारसी के बड़े हिंदुस्तानी शायर हैं। खुद ग़ालिब ने अपने फ़ारसी कलाम को अपने उर्दू कलाम पर तरजीह दी। उनके अनुसार यह अजीब-ओ-ग़रीब बात है कि फ़ारसी के बजाय उर्दू कलाम से शोहरत मिली। 

होगा ऐसा भी कोई जो ग़ालिब को न जाने 

शायर तो अच्छा है प’ बदनाम बहुत है

ग़ालिब के अशआर इतने मशहूर हैं कि साहित्य और शायरी से दूर आम आदमी भी उन्हें मुहावरे की तरह इस्तेमाल करता है। इस की सबसे बड़ी वजह यह है कि ग़ालिब ने इंसानी ज़िन्दगी और चेहरों को पढ़ा है और इंसानी जज़्बात और एहसासात को छुआ है। 

 

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

 

ग़ालिब आम रास्तों पर चलने वालों में से नहीं थे। वह हर हाल में रवायत को चैलेन्ज करने वाले थे। वह हमेशा पुरानी रवायतों के पहाड़ों को तोड़ कर नये रास्ते और नई मंज़िलें बनाने की कोशिश में रहते थे। 

क़र्ज़ से पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ 

रंग लायेगी हमारी फ़ाक़ा मस्ती ऐक दिन

ग़ालिब की शायरी हर उम्र के पाठक के लिए है। उनकी शायरी में अगर बड़ों के दिलों के दर्द की दवा मौजूद है तो नौजवानों के मोहब्बत में टूटे हुये दिलों के ज़ख्मों का मरहम भी

 

इश्क़ ने हम को निकम्मा कर दिया

वरना हम भी आदमी थे काम के

 

किसी भी शायर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वो किसी भी विषय को इस अंदाज़ में पेश करे कि पढ़ने वाला या सुनने वाला खुद बखुद उसके दाम में आ जाए और दाद देने पर मजबूर हो जाए। यह हुनर ग़ालिब को खूब आता था और उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी था कि उनका डिक्शन, उनका अंदाज़े बयान, उनका तर्ज़े इज़हार और उनका लफ़्ज़ों का इंतिखाब जुदागाना है। 

 

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे 

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े बयाँ और

 

ग़ालिब की शायरी में तंज़ का पहलू भी मौजूद है। वो हँसना भी जानते थे और हँसाना भी और कभी खुदा, कभी महबूब और कभी दुनिया पर तंज़ करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते थे। लेकिन उनके तंज़ में भी ऐक ख़ास तरह का पैग़ाम छुपा होता है कि ग़ालिब बतौर शायर या फनकार खुदा और खुदा की बनाई हुई कायनात को देखते हैं। 

 

पकडे जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक़ 

आदमी कोई हमारा दमे तहरीर भी था

 

मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब 27 दिसम्बर 1797 को आगरा में पैदा हुये। मुग़ल बादशाह की तरफ से नजमउद्दौला, दबीर-उल-मुल्क और निज़ाम जंग के खिताब से नवाज़े गए। 15 फरवरी 1869 को ने ग़ालिब जैसे महान क़लमकार ने इस संसार को अलविदा कह दिया मगर आज रोबोटिक ऑटोमेशन के ज़माने में भी ग़ालिब की अहमियत बरक़रार है और आइंदा भी रहेगी। 

 

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है 

वो हर एक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता

 

(लेखक जाने माने उर्दू शायर हैं और उन्होंने मीराबाई की कविता का उर्दू अनुवाद भी किया है )