Shubhneet Kaushik

रैदास कबीर और नामदेव की परंपरा के कवि हैं। वह परंपरा जिसमें सेन, पीपा, धन्ना आदि भी आते हैं। जिनमें कोई दरजी है, तो कोई जुलाहा, तो कोई नाई। ख़ुद रैदास चमार जाति के : ‘कहै रैदास खलास चमारा’

पर सभी का विश्वास मानवता में, मानव-धर्म की सार्वभौमिकता और सार्वकालिकता में। रैदास मनुष्यमात्र की समता में यकीन करने वाले कवियों में अग्रणी हैं। इस परंपरा में नामदेव, कबीर आदि उनसे पहले हो चुके थे, जैसा कि ख़ुद रैदास ने कहा :

नामदेव कबीर तिलोचन साधना सेन तरै।
कह रविदास, सुनहु रे संतहु! हरि जिउ तें सबहि सरै।

पीपा जो ख़ुद राजपूत थे, और गागरोन की रियासत के राजा भी, कबीर की महिमा बताते हुए लिख चुके थे :

जो कलिनाम कबीर न होते तो लोक बेद
और कलिजुग मिलि कर भगति रसातल देते।

कबीर और नामदेव की भाँति ही रैदास की ‘बानी’ को भी ‘आदि गुरुग्रंथ साहब’ में जगह मिली। आज जरूरत इस बात की भी है कि संत की आभा से परे कवि रैदास की कविताई, उनके सरोकारों और उनकी कविता में अभिव्यक्त होने वाले विचारों को गहराई से समझा जाय। ईश्वर से एकाकार होने की अपनी धारणा को रैदास ने इस पद में बख़ूबी व्यक्त किया :

जब हम होते तब तू नाहीं, अब तू ही, मैं नाहीं।
अतल अगम जैसे लहरि मई उदधि, जल केवल जलमाहीं॥

कवि रैदास ने अपने अनेक पदों में ‘बेगमपुरा’ का उल्लेख किया है। बेगमपुरा यानी एक ऐसी जगह जो सामाजिक भेद-भाव, असमानता, जात-पात से सर्वथा मुक्त हो। जहाँ किसी किस्म का दुख या विकार न हो! रैदास कहते हैं :

बेगमपुरा सहर का नांउ। दुख अंदेस नहीं तिहिं ठाँउ॥
कह रैदास खलास चमारा जो हम सहरी सों मीतु हमारा।

ध्यान देने की बात है कि कवि रैदास का ‘बेगमपुरा’ कोई यूटोपिया नहीं है, न ही यह किसी परलोक की कल्पना है। रैदास तो इसी धरती पर, अपने इर्द-गिर्द ‘बेगमपुरा’ की संकल्पना करते हैं और उसे मूर्त रूप देने के लिए हरसंभव कोशिश करते हैं।


रैदास जु है बेगम पुरा, उह पूरन सुख धाम।
दुख अंदोह अरु द्वेष भाव, नाहिं बसें तिहि ठाम॥

ऐसा बेगमपुरा जहाँ हर किसी को अन्न मिले, कोई भूखा न रहे, सभी समान हों और इसी में कवि रैदास की भी प्रसन्नता निहित है :

ऐसा चाहू राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न |
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न ||

Note :- 31 जनवरी 2018 को लेखक ने ये लेख अपने फ़ेसबुक वाल पर लिखा था।