वीर विनोद छाबड़ा


दुनिया के सबसे बड़े विदूषक चार्ली चैपलिन का इंतक़ाल आज ही के दिन 1977 में हुआ था। पेश है उनकी याद में उनकी एक फिल्म दि ग्रेट डिक्टेटर (1940) के पीछे की कहानी।


यह चार्ली चैपलिन की सबसे कामयाब और उद्देश्यपूर्ण फिल्म है। और यह चैपलिन की पहली बोलती फिल्म भी थी। हालांकि फिल्म का एक बड़ा हिस्सा साइलेंट है, चैपलिन की पिछली तमाम फिल्मों की तरह। मगर ऐसा फिल्म फिल्म की ज़रूरत थी।

जर्मनी का एडोल्फ हिटलर तीस और चालीस के सालों का एक वीभत्स सोच का खब्ती और नस्लवादी शख़्स था। यहूदियों से तो उसे ख़ास नफ़रत थी। इसी वज़ह से उसने लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में ठूंस ठूंस कर मरवा दिया। उसके इसी नस्लवादी सनकपन ने दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध में ढकेल दिया था।

चैपलिन ने हिटलर का मखौल उड़ाने की ग़रज़ से ही ‘दि ग्रेट डिक्टेटर’ यह बनाई थी। लेकिन चैपलिन को कई तरह का भय भी था – ऐसा न हो कि हिटलर के सनकीपन पर कोई प्रतिक्रिया ही न हो। उलटे मेरा मज़ाक उड़े। लोग यह कहें कि चार्ली चैपलिन स्पेंट फोर्स हैं अब, मतलब खाली कारतूस। मुझे और मेरी फिल्म को घटिया कहें।
चार्ली को यह भी ख़तरा था कि नाज़ी सोच के लोग उनके घर पर पत्थर फेंकेंगे।
इसीलिए इस सिलसिले में उन्होंने एक लंबा रिसर्च भी कराया। अपने दोस्तों से भी सलाह ली।
कई शुभचिंतकों ने मना कर किया कि खतरा है। हो सकता है कि कई देशों में यह फिल्म प्रतिबंधित हो जाए। नाज़िओं के समर्थकों और विरोधियों के बीच भीषण दंगे भी हो सकते हैं। सिनेमाहाल फूंक दिए जाएं। युद्ध की विभीषिका झेल रहा यूरोप ज्यादा बड़े संकट में आ जाये। यह भी संभव है कि इस युद्ध में नाज़िओं की जीत हो और चार्ली चैपलिन को सूली पर चढ़ना पड़े।
मगर तमाम तरह से डराने वालों की सलाह को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने मित्र डगलस फेयरबैंक्स की सलाह पर फैसला किया कि दुनिया के महाखलनायक का मुक़ाबला उसी की शक्ल का दुनिया का महाविदूषक करेगा। ऐसा करना उनका फ़र्ज़ है और मानवता व सच की सेवा भी। जान जाती है तो जाए। कम से कम संसार की सबसे बड़ी घटना के तौर पर ज़माना इसे याद तो रखेगा।
मगर जब ‘दि ग्रेट डिक्टेटर’ रिलीज़ हुई तो तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुई और फिल्म सुपर हिट हुई। बहुत सराही गई यह फिल्म।


मगर हिटलर की नाज़ी सोच के समर्थकों के डर से दक्षिण अमरीका के कई देशों में प्रतिबंधित हुई। यूरोप में भी इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। कई जगह से फिल्म उतार ली गई। इंग्लैंड ने भी शुरुआती विरोध के दृष्टिगत इसकी रिलीज़ रोकने का फैसला किया। लेकिन सरकार के चुनींदा अफ़सरों ने फिल्म देखने के बाद सरकार को सलाह दी कि नाज़ियों के विरुद्ध प्रोपेगंडा के लिए ये फिल्म मज़बूत हथियार है। और ब्रितानी सरकार ने फिल्म रिलीज़ कर दी।

तानाशाहों के दुश्मन चार्ली चैपलिन को सलाम।

२५ दिसंबर २०१८