Shubhneet Kaushik

वर्ष 1948 में भोजपुरी सम्मेलन का आयोजन बलिया में हुआ, जिसकी अध्यक्षता महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने की। 4 अप्रैल 1948 को आयोजित हुए इस सम्मेलन में राहुल सांकृत्यायन के साथ भोजपुरी भाषा और साहित्य के अधिकारी विद्वान डॉ. उदयनारायण तिवारी ने भी भाग लिया। बलिया के भूगोल के बारे में राहुल अपनी आत्म-कथा ‘मेरी जीवन-यात्रा’ में लिखते हैं ‘बलिया वस्तुतः शहर नहीं, एक बड़ा-सा गाँव है। गंगा नातिदूर बहती है, और धार को कोई बाँध नहीं है, गाँव बिलकुल गंगा पर निर्भर हैं। टोंस जो यहाँ सरजू (छोटी) कही जाती है, बलिया के पास बहती है। वस्तुतः बलिया के कटने का डर सरजू से ही है।’ इस यात्रा के दौरान राहुल जी बलिया के जिला-बोर्ड के सेक्रेटरी श्यामसुंदर उपाध्याय के यहाँ ठहरे।

उल्लेखनीय है कि 1947 में राहुल बंबई में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे। ’48 के भोजपुरी सम्मेलन के बारे में राहुल ने लिखा है कि सम्मेलन के दौरान उन्हें बार-बार चित्तू पांडे की याद आती थी। इसी सम्मेलन में भोजपुरी प्रांत निर्माण का प्रस्ताव भी पास किया गया।

इस संदर्भ में राहुल जी की टिप्पणी है : ‘तीन करोड़ भोजपुरी भाषी दो-दो प्रान्तों में बंटे रहें, और उनकी भाषा की कोई कदर न हो, यह दुख की बात थी। लेकिन आजकल जनता और उसकी भाषा की पूछ भला दिल्ली के देवताओं के दरबार में हो सकती थी?’ पर राहुल नाउम्मीद नहीं होते और आशा जताते हैं कि ‘जनता का दिन लौटेगा जरूर’। भोजपुरी सम्मेलन में हुए कवितापाठ में उन्होंने डॉ. रामविचार पांडे और भोजपुरी के अन्य युवा कवियों की कविताओं को खुले मन से सराहा।

इसी दौरान राहुल सांकृत्यायन बलिया के चलता पुस्तकालय में भी गए। जिसके बारे में उन्होंने लिखा है : ‘चलता पुस्तकालय में पुस्तकें तो तीन हजार ही थीं, जिनका उपयोग बहुत अच्छी तरह किया जाता था। वह बराबर घूमती रहती थीं। पुस्तकालय ने अपना मकान भी बना लिया, आशा है, वह तेजी से बढ़ेगा।’

बता दें कि बलिया के चलता पुस्तकालय की स्थापना वर्ष 1942 (विक्रम संवत 1999) में हुई थी। इसकी स्थापना में ‘बलिया हिन्दी प्रचारिणी सभा’ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसकी स्थापना 1923 ई. (वि. सं. 1980) में हुई थी। चलता पुस्तकालय की स्थापना में बलिया के जिन लोगों ने प्रमुख भूमिका निभाई, वे थे : काशीनाथ मिश्र, विश्वनाथ पाण्डेय, शिवप्रसाद सिंह, महादेव प्रसाद, शिवराम गोपीराम, विष्णुचंद रौनियार, रामसिंहासन मिश्र, केदारनाथ सिन्हा, हरिकृष्ण राय, कविलास चतुर्वेदी और बालगोविंद राम जी ‘निषाद’ आदि।

पर आज घनघोर उपेक्षा के चलते यह गौरवशाली पुस्तकालय अपने दुर्दिन देख रहा है। ये पुस्तकालय जो बगैर किसी सरकारी अनुदान के लोगों के स्नेह से उठ खड़े हुए थे। आज आज़ाद भारत में धनाभाव और समाज के उपेक्षित रवैये के चलते खत्म होने के कगार पर हैं। हमारे समाज ने अभाव के दिनों में गैर-बराबरी को पाटने के जो पुल खड़े किए थे, वे पुल आज हमारे देखते-देखते ढह रहे हैं।