राष्ट्रवाद का पैमाना : फणीश्वरनाथ रेणु जो बेहिचक भारत माता के साथ नेपाल को भी अपनी माँ बोलता था।

Shubhneet Kaushik

“मैला आँचल” के अप्रतिम रचनाकार रेणु को याद करते हुए आज “मैला आँचल” और “परती परिकथा” सरीखी कालजयी कृतियों के रचयिता फणीश्वर नाथ रेणु (4 मार्च 1921- 11 अप्रैल 1977) का 96वां जन्मदिवस है। बिहार के पूर्णिया जिले के औराहीहिंगना में जन्मे रेणुजी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहे। भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वाले रेणु सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे।

1954 में प्रकाशित हुआ उनका उपन्यास “मैला आँचल” हिन्दी साहित्य की धरोहर है। बार-बार पढ़ने लायक। “मैला आँचल” की भूमिका में रेणु लिखते हैं: “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चन्दन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” और अंत में उनकी यह ईमानदार स्वीकारोक्ति भी कि ‘जो भी हो, अपनी निष्ठा में कमी महसूस नहीं करता।’

पूर्णिया की माटी की सोंधी गंध को अपने में समोए हुए यह उपन्यास, और साथ ही, रेणु जी का पूरा रचना-कर्म ग्रामीण अंचल के गीतों की खनक से समृद्ध है। पर रेणु के निकट आते ही “आंचलिकता” उनकी सीमा न रहकर उनकी शक्ति बन जाती है।

साहित्य में आंचलिकता पर बहस उठी तो रेणु को भी लोग खींच लाये बहस में। और लाते भी क्यों न? खुद रेणु ने लिखा था: “यह है ‘मैला आँचल’, एक आंचलिक उपन्यास”। हिंदी की पत्रिका ‘सारिका’ ने इसी प्रश्न पर एक परिचर्चा आयोजित की। परिचर्चा में रेणु भी थे। बेहद विनम्रता के साथ रेणु ने अपना वक्तव्य दिया, जाहिर है आंचलिकता के पक्ष में ही।

पर रेणु की विश्व-दृष्टि और उनकी विशद जानकारी का परिचय पाना हो तो, जनवरी 1962 में ‘सारिका’ में छपा यह लेख पढ़ना चाहिए। शीर्षक ठेठ रेणु के अंदाज़ में: “पतिआते हैं तो मानिए आंचलिकता भी एक विधा है”। रेणु आंचलिकता की बात करते हुए उसी सहजता के साथ मिखाइल शोलोखोव, विलियम फाकनर, इर्वा आन्द्रिच, नाज़िम हिकमत की नवीनतम कृतियों का उल्लेख करते हैं जिस सहजता से वे शरत बाबू और सतीनाथ भादुड़ी का ज़िक्र करते हैं।

समाज की विद्रूपताओं को, राजनीति की जटिलता को जितनी बारीकी से रेणु पकड़ते हैं, वह एकबारगी हतप्रभ कर देती है। गाँव के लोगों की फक्कड़ता, उनके मनमौजी स्वभाव और खिलंदड़ेपन को कभी गीतों के जरिये तो कभी कथाक्रम में जब-तब प्रकट होने वाले पात्रों के जरिये रेणु बिलकुल सहज ही प्रकट कर देते हैं। उनकी कहानियाँ भी अद्भुत हैं और वैसे ही प्रभावशाली हैं उनके रिपोर्ताज़।

आज़ादी के ठीक बाद के दशक के हिंदुस्तान का, उसकी जिले के स्तर पर होती राजनीति का विशद वर्णन किया है रेणु ने, अपनी कृतियों में। जिनमें गाहे-बगाहे बावनदास जैसे चरित्र (“मैला आँचल” में) आपको राष्ट्रीय आंदोलन की समृद्ध विरासत की याद तो दिलाते हैं, पर उनकी जो अंतिम परिणति होती है, वह हृदयविदारक है। इसी क्रम में, “परती परिकथा” के भिम्मल मामा के किरदार को लिया जा सकता है, जो अपनी ख़ास ‘भिम्मलीय’ भाषा में सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस करते हैं।

आज के राष्ट्रवाद के पैमाने पर रेणु के उस राष्ट्रवाद को कैसे नापा जाएगा, जो बेहिचक भारत माता के साथ नेपाल को भी अपनी माँ बोलता था। बेशक छोटी माँ ही सही। रेणु ने नवंबर 1961 में एक लेख लिखा था: “नेपाल – मेरी सानोआमाँ”। सानोआमाँ यानी छोटी माँ। इसी लेख में रेणु ने लिखा है: ‘जब कभी नेपाल की धरती पर पाँव रखता हूँ पहले झुककर एक चुटकी धूल सिर पर डाल लेता हूँ। रोम-रोम बज उठते हैं – स्मृतियाँ जग पड़ती हैं। जय नेपाल, नेपाल मेरी सानोआमाँ।”

ये वही रेणु हैं जो 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण महज नौ वर्ष की उम्र में चौदह दिनों के लिए जेल गए।

4 मार्च 2017 को लेखक ये लेख अपने फ़ेसबुक वाल पर लिखा था।


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