ध्रुव गुप्त

दक्षिण भारत से आने वाली हिंदी फिल्मों की सबसे मधुर, सबसे संज़ीदा आवाज़ येशु दास अपनी तरह के बिल्कुल अलग-से गायक रहे हैं ! आए न बालम का करूं सजनी, जब शाम ढले आना जब दीप जले आना, मधुबन खुशबू देता है, तू जो मेरे सुर में सुर मिला दे, दिल के टुकड़े-टुकड़े कर के मुस्कुरा के चल दिए, चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा, तुम्हें देखकर जग वाले पर यकीं नहीं क्योंकर होगा, ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है, जानेमन जानेमन तेरे दो नयन, आज से पहले आज से ज्यादा ख़ुशी आजतक नहीं मिली, चांद अकेला जाए सखी री, कोई गाता मैं सो जाता, कहां से आए बदरा, माना हो तुम बेहद हसीं ऐसे बुरे हम भी नहीं, तेरी छोटी सी एक भूल ने सारा गुलशन जला दिया, काली घोड़ी द्वार खड़ी, सुरमई आंखों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे, ओ गोरिया रे तेरे आने से, धीरे धीरे सुबह हुई जागो हे ज़िंदगी – हिन्दी सिनेमा को ऐसे सैकड़ों अमर गीत देने वाले अनोखे गायक काट्टश्शेरि जोसफ़ येशुदास अपनी आवाज़ की शास्त्रीयता, गंभीरता, सादगी और दिल में उतर जाने वाली मधुरता के लिए जाने जाते हैं। दक्षिण भारतीय भाषाई फिल्मों में स्थापित होने के बाद संगीतकार सलिल चौधरी के साथ फ़िल्म ‘आनंद महल’ के गीत ‘आ आ रे मितवा’ से हिंदी सिनेमा में शुरूआत करने वाले केरल के येशुदास देश के पहले गायक हैं जिन्होंने हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तमिल, तेलगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, उड़िया, पंजाबी, अंग्रेजी, लैटिन, रूसी और अरबी भाषाओं में पचपन हज़ार से ज्यादा गीत गाए हैं। इतना कुछ हासिल करने के बावज़ूद उनकी तमन्ना रही कि वो मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण की स्तुति गाएं, पर मन्दिर के नियमों के अनुसार ईसाई येशुदास को मन्दिर में कभी प्रवेश नही मिल सका। उन्हें गायिकी के लिए सात राष्ट्रीय पुरस्कार और 43 अन्य सम्मान मिले हैं। पश्चिमी संगीत के शोर में अरसे से हिंदी सिनेमा के परिदृश्य से ओझल येशुदास के जन्मदिन (10 जनवरी) पर उनके लंबे और सुरीले जीवन की ढेर शुभकामनाएं, उन्हीं की गाई फिल्म ‘सावन को आने दो के गीत की पंक्तियों के साथ !

मैंने गीतों में छवि तेरी बनाई बरसों
दूर रहकर तुझे आवाज़ सुनाई बरसों
किसलिए तूने मुझे ग़ैर बना रखा है

तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है
मैंने दुनिया से अलग गांव बसा रखा है !

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।