महताब अली पीरज़ादा

सिलसिला आलिया रहीमियां रायपुर के बानी मखदूमुल उलेमा, मुर्शद रब्बानी, कुतुबे आलम हज़रत अक़दस मौलाना शाह अब्दुल रहीम रायपुरी कुददुस्सरह हैं ! आपने इस सिलसिले आलिया का आग़ाज़ अपने पीरो मुर्शद के हुक्म पर (1300 हिजरी )1882 ईस्वी में गांव रायपुर जिला सहारनपुर से किया इसलिए यह सिलसिला आलिया रहीमिया रायपुर के नाम से मशहूर हुआ।। आप की पैदाइश (1270 हिजरी) 1853 ईसवी में मौजा तिगरी जिला अंबाला अब जिला यमुनानगर हरियाणा इंडिया में हुई आपके वालिद गिरामी हज़रत राव अशरफ अली साहब थे जो के सैय्यदुल ताइफ़ा हजरत हाजी इमदादुल्लाह महाजिर मक्की के मुरीद और मुतावसिल थे, हजरत हाजी महाज़िर मक्की साहब ने आपका नाम अब्दुर्रहीम रखा अपने अपने इबतदायी तालीम अपने गांव तिगरी में हासिल की और फिर दरसे निजामी की किताबें लुधियाना में  हजरत मौलाना मुहम्मद लुधियानवी दादा हजरत मौलाना हबीबुर्रहमान लुधियानवी वैगैरह से पढी।। इसके बाद आपने मदरसा मज़ाहिर उलूम सहारनपुर में हजरत मौलाना मुहम्मद मज़हर नानोतवी, हज़रत मौलाना अहमद अली मोहदिस सहारनपुरी,(हज़रत शाह मुहम्मद इस्हाक़ देहलवी)से 1874 ईo मे दोरे हदीस शरीफ पढ़ कर दीनी अलुम तकमील की।

तालिबे इल्मी के ज़माने में ही आपने ग़ालिबन 1871 में हज़रत मियां अब्दुर्रहीम सहरानपुरी से बैत की और सलूक वा हासन  की तालीम व तरबियत मुक़म्मल कि ।। मियां शाह अब्दुल रहीम सहारनपुरी  सीमा प्रांत के एक मशहूर बुजुर्ग अखुंद अब्दुल ग़फ़ूर स्वाती उर्फ सैय्यदु बाबा साहिब के जानशीन थे, यह अखुंद साहब मुजाहिद क्रांतिकारी थे जो अंग्रेजों के सख्त खिलाफ थे हजरत मौलाना शाह अब्दुरहीम साहब को मियां अब्दुल रहीम सहारनपुरी ने अंग्रेजों के विरुद्ध कार्य करने के लिए ही मुरीद बनाया था।।वही दूसरी तरफ अपने दौर में इमाम शाह वलीउल्लाह देहलवी रहमतुल्लाह के सिलसिले के अज़ीम वारिस हज़रत हाजी इम्दादुल्लाह महाजिर मक्की और इन के जानशीन इमामें रब्बानी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गगोही के ख़लीफ़ा ओर जानशीन हैं।

हजरत मौलाना शाहअब्दुरहिम का ननिहाल रायपुर गांव में ही था इस कारण पढ़ाई के समय से ही आप वहां आ जाया करते थे लेकिन शिक्षा प्राप्ति के पश्चात जब आपने अपने गुरु मियां अब्दुल रहीम से अध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त कर ली तो उन के आदेशानुसार आप रायपुर गांव की ओर चले गए, सबसे पहले आपने रायपुर गांव के पास ही आलमपुर नामक गांव के बाग में एक झोपड़ी डाली जहां आपके पास क्षेत्र के गरीब लोग आते और आपसे मिलते और बातें करते यह रिआया और ज़मीदार का समय था रायपुर के राव लोग बड़े जमीदार थे, इसलिए गांव रायपुर के जमीदार जो आपके रिश्तेदार भी थे उनको यह बात पसंद नहीं आई कि उनके रिश्तेदार गरीबों के बीच में रहे और वे लोग बिना तकल्लुफ बातें करें इससे वे उनको जंगल से उठा लाए और गांव की जामा मस्जिद में ले आए और एक अच्छा कमरा मस्जिद में रहने को दे दिया कुछ दिन तो वहां आप रहे लेकिन यहां रहना आपको कैद से भी बुरा लगता था आपकी तबीयत वहां बिल्कुल भी नहीं लगी तबीयत नहीं लगने के कारण यह था कि साधारण गरीब आदमी आपसे नहीं मिल सकता था जिन से उनको दिली लगाव था जब गांव वालों ने देखा कि आप ग़मज़दा रहते हैं तो आपके लिए गांव के पश्चिम की ओर नहर के दाएं किनारे पर बाग में एक स्थान बनाकर फूस का एक बंगला तैयार किया और आप उसमें रहने लगे,आप एकांत प्रिय थे।

रायपुर आने के बाद आपके मन में हज करने की इच्छा जागी जब हज की तैयारी कर ली तो आप अपने पीर मियाँ अब्दुर्रहीम से मिलने सहारनपुर गए अगला जहाज जो दो सप्ताह बाद जाने वाला था आप के पीर ने उस में जाने की अनुमति दे दी आप उससे जद्दा पहुंचे।

जब हज़रत शाह अब्दुर्रहीम साहब मक्का शहर में पहुंचे तो सबसे पहले वह हज़रत हाजी इमदादुल्लाह साहब की खिदमत में गए उनसे क्रांतिकारी की दीक्षा ली फिर हज कर के खैरियत से स्वदेश लौट आए 1857 ईसवी के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय शामली के मैदान में जब मुस्लिम क्रांतिकारी अंग्रेजों के मुकाबले में हार गए तो दूसरे क्रांतिकारियों के साथ हाजी इमदादुल्लाह साहब जो शामली युद्ध के संयोजक थे का भी वारंट गिरफ्तारी जारी हो गया उस समय हाजी इमदादुल्लाह साहब रूपोश होकर अंग्रेजों से बचते बचाते अरब देश के मक्का शहर में पहुंच गए और वही अस्थाई रूप से रहने लगे अब कोई भी देशभक्त मुसलमान भारत से अरब हज के लिए जाता तो अपने नेता हाजी इम्दादुल्लाह से मिलने को अपना सौभाग्य समझता ।।

जब आपके सहारनपुर के पीर मियां अब्दुल रहीम सहरानपुरी का इंतकाल हो गया तो अब आप ने हज़रत रशीद अहमद गंगोही को अपना पीर बनाया हजरत गंगोही ने आपको खिलाफत भी इनायत ही अब आप आना जाना हज़रत रशीद अहमद गगोही के दरबार मे हो गया।

हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहब के अरब चले जाने के पश्चात उनके कार्य को मौलाना कासिम कासिम नैनोतवी देख रहे थे इसके पश्चात हज़रत नानोतवी का इंतकाल हो गया तो हजरत मौलाना रशीद अहमद गंगोही इस क्रांति के जिम्मेदार बनाए गए मौलाना रशीद अहमद पूरे भारत के मुस्लिम क्रांतिकारियों के जिम्मेदार थे विदेशों से भी कुछ लोग आकर आपसे मिलते थे शाह अब्दुर्रहीम साहब भी उनसे मिलते थे, हजरत गंगोही की मृत्यु के पश्चात इस क्रांति के कर्ता-धर्ता शेख उल हिंद हजरत मौलाना महमूदउल हसन साहब बने जिस शक्ति का शाह अब्दुर्रहीम पर गहरा प्रभाव पड़ा 

शैखुल हिंद जिस पर अटूट विश्वास करते थे और जिन से दिली मशवरा करते थे वह हजरत मौलाना शाह अब्दुर्रहीम रायपुरी थे इस प्रकार हजरत गंगोही और शेखुल हिंद के संपर्क में आने से मुस्लिम क्रांतिकारियों से पूर्ण रूप से जुड़ गए ।

भारत में क्रांति का संगठन

धन और प्रचार का काम हजरत ने अपने हाथ में लिया क्रांतिकारी मुजाहिद और विश्वास पात्र साथी तलाश करना से शेखुल हिंद को सौंपा जिन्होंने यह कार्य दारुल उलूम देवबंद के माध्यम से किया

प्रचार का कार्यक्रम

हजरत रायपुरी के आसपास के गांव के लोगों के आने का तांता लगा रहता था और हज़रत भी दूर-दूर तक गांव और शहरों में जाया करते थे जहां भी आप जाते थे वही एक मदरसा चालू कर देते थे वहां के प्रभावपूर्ण मुसलमानों को उस का प्रबंधक बना देते थे जिससे वह मदरसा उनकी क्रांति का एक छोटा सा यूनिट बन जाता था इस प्रकार धर्म के नाम के साथ उनकी क्रांति का भी प्रचार होता था जितना प्रभाव आपका निर्धनों पर था उतना ही धनी लोगों पर भी था जमीदार राजा और नवाब आपके इशारे को समझते थे आप लोगों से चंदा कह कर नहीं मांगते थे बल्कि लोगों से अपनी ज़रूरत की बात कह देते थे उसको सुनकर ही लोग रुपए देना आरंभ कर देते थे जब जंगे बलकान का आरंभ हो गया और डॉक्टर अंसारी तथा दूसरे केंद्रीय नेताओं ने चंदे की अपील की तो हज़रत रायपुरी ईद के दिन लोगों से चंदे के लिए कहा कि एक ही दिन में ₹25000 चंदा हो गया जो उस समय की चंदे की इतनी बड़ी रकम एक रिकार्ड थी जो मदरसे आप खोलते थे उनमें आप एक क्रांतिकारी मेंबर भेजते थे जो आपका विश्वासपात्र व्यक्ति होता था देखने में वो एक मौलवी होता था परंतु देश का एक क्रांतिकारी मुजाहिद बच्चों को पढ़ाने के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध प्रचार का काम भी करता था। यह छोटे बड़े अरबी मदरसे हज़रत रायपुरी ने कलकत्ते से लेकर काबूल तक और मद्रास लेकर कराची और बलूचिस्तान तक फैला रखे थे यह सब क्रांति के अड्डे थे इन सब को अंग्रेज़ मुल्लाओ के मकतब ही समझता रहा था, इन सब मदरसों का बड़ा मदरसा दारलूम देवबंद था जो अंतरराष्ट्रीय क्रांति का अड्डा था

क्रांति की रूपरेखा

 सशस्त्र अंदोलन इनका मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजी सेना द्वारा युद्ध करके उनसे अपनी खोई हुई आजादी प्राप्त करना था फौज कैसे तैयार की जाए भारत में अंग्रेजी राज्य हैं करे तो क्या करें इस बात से बचने के लिए इन लोगों ने यह योजना बनाई कि भारत से बाहर मुस्लिम हुकूमत अंग्रेजो के खिलाफ जो सरकारें हैं उनसे फौजी सहायता देकर अफगानिस्तान के मार्ग से भारत पर आक्रमण किया जाए जब भारत पर विदेशी सेनाएँ आक्रमण करें तो  देश की जनता उन फौजो का स्वागत करें अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दें अंग्रेज़ो को शक्तिहीन बनाकर  देश से बाहर निकाल दें।

हजरत शेख उल हिंद मौलाना महमूद हसन के पास सूचनाएं आ रही थी की क्रांति को आरंभ किया जाए अचानक प्रथम महायुद्ध के घोर बादल संसार पर मंडराने लगे, साथियों का विचार था कि हजरत शेख उल हिंद को सीमा प्रांत से होते हुए अफगानिस्तान काबुल भेजा जाए शाह अब्दुर्रहीम इस बात से सहमत नहीं थे आपने सुझाव दिया कि काबुल में किसी नौजवान मुजाहिद को भेजा जाए सुझाव सभी ने पसंद किया काबुल में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को भेजा गया,हज़रत के करीबी चौधरी सिद्दीक़ साहब ने काबुल जाने के लिए रकम मुहैय्या कराई थी।

हजरत मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी को काबुल के लिए भेजकर हज़रत मौलाना महमूद उल हसन साहब अरब जाने से पहले रायपुर तशरीफ़ लाए ओर दो दिन हज़रत के पास रहे जब वहां से रुखसत होने लगे तो नाले को पार कर रहे थे वहां से तीन चुल्लू पानी पिया और फिर यह दुआ मांगी खुदा वंदे करीम अपने मुल्क का यह शीरी पानी हमें फिर से नसीब करना “इस पर सब ने कहा आमीन !

शेख उल हिंद को अपने मुल्क का शीरी पानी तो नसीब हो गया लेकिन हज़रत से मिलना नसीब नहीं हो सका।।

हजरत रायपुरी को अपना जानशीन बनाना:-

जब हजरत शेख उल हिंद अरब जाने लगे तो अपने तमाम दिल्ली कोलकाता मुंबई लाहौर आदि के सभी मुरीदों को यह फरमा गए थे कि मेरे बाद मेरा कायम मुकाम हज़रत शाह अब्दुर्रहीम रायपुरी को समझना।

जब आप अरब अब चले गए तो पूरे भारत की क्रांति की जिम्मेदारी हजरत रायपुरी कंधों पर आन पड़ी थी हजरत मौलाना हुसैन अहमद मदनी अपनी पुस्तक नक्शे हयात ज़िल्द 210 208 क्रांति  के नामों में देवबंद दीनपुर शरीफ, कराची खंड दिल्ली और चकवाल बताया है क्योंकि मरकज रायपुर और देवबंद सहारनपुर में एक ही केंद्र माना जाता था इन केंद्रों द्वारा हजरत रायपुरी जो काम कर रहे थे वह मोटे रूप से निम्न प्रकार थे :-

1 :-दारलूम देवबंद की पूरी जिम्मेदारी संभालना !

2:-जनता में अंग्रेजो के खिलाफ बगावत का प्रचार करना !

3:- भारतीय क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन करना !

4:-लोगों से चंदा लेकर सीमा प्रांत में क्रांतिकारियों के पास भेजना !

5:-क्रन्तिकारीयो के परिवार की खबर गिरी करना !

उपयुक्त कार्यों को आपने जिस सावधानी और लगन से पूरा किया इस बात का पता इससे चलता है कि आप पंजाब के एक गांव खानपुर में गए वहां प्रातः काल की नमाज पढ़कर मस्जिद के बाहर गेट को बंद कर दिया और लोगों से कहा प्रत्येक व्यक्ति को आज चंदे में कोई ना कोई जानवर देना होगा। जितने नमाज़ी थे उन्होंने अपनी शक्ति के मुताबिक एक जानवर आपको दिया इन सब जानवरों का मूल्य उस समय 17000 था एक ही गांव से इकठ्ठा हुआ जो सब आपने कुछ क्रांतिकारियों को भेज दिया और कुछ उनके परिवारों में बांट दिया 

1975 ईस्वी में जमीअतुल उलमा हिंद ने रेशमी खतूत साजिशकेस के नाम से एक पुस्तक प्रकाशित की जो अंग्रेजी सरकार द्वारा चलाए गए मुकदमों की फाइल है जो इंडिया हाउस लंदन से मगाकर उसका अनुवाद हुआ है पुस्तक के अंत में कौन क्या है नाम से एक पृष्ठ है उसमें प्रिशिष्ट हैं उसके पृष्ठ। 188 पर रिपोर्ट है।

हजरत मौलाना के नाम खत में इसका तज़करा यह है कि ग़ालिबन रायपुर जिला सहारनपुर यूपी के जो मोलवी अब्दुर्रहीम हैं, जो मौलाना रायपुरी के नाम से मशहूर है यह मौलाना महमूद की जिहाद की स्कीमों में शरीक थे यह देवबंद के मदरसे की कमेटी में भी शामिल थे ऐसा मालूम होता है कि मौलाना महमूद की अनुपस्थिति में इन्हें नयाब नुमाइंदे के तौर पर रुपया जमा करने और उसे हमदुल्ला को पहुंचाना था ।मौलाना हमदुल्ला हज़रत शेखुल हिन्द की डाक देखते ओर पत्र व्यवहार करते।

हजरत शाह अब्दुल रहीम रायपुरी की (वफात )मृत्यु:-

हजरत मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी ने अपनी पुस्तक सवानेह हजरत मौलाना अब्दुल कादिर रायपुरी में लिखते हैं शाह अब्दुल रहीम साहब की अलालत का सिलसिला वफ़ात से पांच छः साल पहले शुरू हो गया था आखिर के रमजान शरीफ में दोनों वक्त का खाना छोड़ दिया था रात का खाना तो रमजान में पहले भी नहीं खाया करते थे मगर इस दफा दोनों वक्त सहरी में अफतारी का तर्क कर दिया था सारी रात सुबह तक कुरान शरीफ ही सुनते रहते थे सहरी के वक्त में सादा चाय लेते।

हज़रत शाह अब्दुल कादिर साहब और दूसरे हज़रात और खसुसि खुद्दाम वे अहले ताल्लुक वही मुकीम और ख़िदमत व तीमारदारी में सरगर्म ओर मूनहमिक थे।

(26 रबी उस्सानी1337 हि०) मुताबिक़ 29 जनवरी 1919 ईo को आप का इंतेक़ाल पेलो नज़दीक कस्बा बेहट ज़िला सहारनपुर हुआ।खानकाह आलिया रहिमिया रायपुर के मकब्रह रहीमी में आप की तदफीन हुई।

आप के जानशीन हजरत मौलाना अब्दुल कादिर रायपुरी हुए

हज़रत शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन साहब शाह अब्दुर्रहीम साहब के लिए दिल से दुआ करते हुए कहते हैं.

अल्लाह के फ़ज़ल व कर्म से आप को अल्लाह की समीपता मिल जाये, वह आप को मुबारक हो, देश से दूर माल्टा जेल में बड़ी हसरत ओर जुदाई की हालत हैं.

इतने महान व्यक्तित्व  के व्यक्ति राष्ट्रीप्रेमी संत कैसे खामोश जीवन को जी कर हमारे बीच से चले गए इस बात के लिए इतिहास भी चुप है.