Shubhneet Kaushik

आरंभिक आधुनिकता (अर्ली मॉडर्निटी) के इतिहासकार संजय सुब्रमण्यम ‘सम्बद्ध इतिहास’ के पैरोकार रहे हैं, जिसे वे ‘कनेक्टेड हिस्ट्रीज़’ का दर्जा देते हैं। मूलतः आर्थिक इतिहासकार रहे संजय सुब्रमण्यम के इतिहासलेखन का दायरा, विषय और काल दोनों ही संदर्भों में, अत्यंत विस्तृत है। अकारण नहीं कि इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने एक लेख में संजय सुब्रमण्यम को ‘मास्टर ऑफ सेंचुरीज़’ कहा है।

ठीक बीस वर्ष पहले, 1997 में, इतिहास की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मॉडर्न एशियन स्टडीज़’ में संजय सुब्रमण्यम का प्रसिद्ध लेख “कनेक्टेड हिस्ट्रीज़: नोट्स टूवर्ड्स ए कन्फ़िगरेशन ऑफ अर्ली मॉडर्न यूरेशिया” छपा। संजय सुब्रमण्यम के अनुसार यूरेशियाई और अफ्रीकी समाजों के विशेष संदर्भ में आरंभिक आधुनिकता का काल, 14वीं सदी के मध्य से आरंभ होकर 18वीं सदी के मध्य तक मानना चाहिए। उनका खास ज़ोर 1450 ई. के बाद हुए परिवर्तनों को गहराई से समझने में है।

वे आधुनिकता को योरोपीय चश्मे से देखने की बजाय, उसके समाज-सापेक्ष अनुभवों, उसके विभिन्न स्रोतों और एकाधिक जड़ों के संदर्भ में समझने की वकालत करते हैं। वैश्विक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में आधुनिकता के उदय को समझते हुए, संजय सुब्रमण्यम का आग्रह है कि आधुनिकता के अर्थ और उसके विविध स्वरूपों से जुड़ी हमारी समझ इस बात पर निर्भर करती है कि हम किस समाज-विशेष के संदर्भ में उसे देख रहे हैं।

इसी संदर्भ में, संजय सुब्रमण्यम इतिहास की यूरोकेंद्रिकता पर सवालिया निशान लगते हैं और आरंभिक आधुनिक काल के संसार को वैश्विक रूप से परस्पर सम्बद्ध रूप में देखने पर ज़ोर देते हैं। संजय सुब्रमण्यम का ध्यान महज व्यापार, वाणिज्य, मुद्रा, असलहा या सैन्य विस्तार के वैश्विक संदर्भ को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे दुनिया में राजनीतिक सीमाओं से परे विचारों, संरचनाओं के संचार और विनिमय को समझने की कोशिश करते हैं। वे आरंभिक आधुनिक काल में स्थानीय, क्षेत्रीय, प्रांतीय और वैश्विक के मिलन-बिंदु और उसकी समूची गतिशीलता को समझने का प्रयास करते हैं।

“डैडलस” पत्रिका के ‘आरंभिक आधुनिकता’ विशेषांक (1998) में प्रकाशित अपने लेख में संजय ने आरंभिक आधुनिकता के कई केंद्र होने की बात कही। और केंद्रों की बजाय परिधि पर स्थित समाजों की गत्यात्मकता और आधुनिकता के बदलते हुए परिप्रेक्ष्य को समझने पर ज़ोर दिया। परिधि पर स्थित ये समाज सांस्कृतिक नवाचारों की बानगी देते हुए समाज हैं।

जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ न सिर्फ एक-दूसरे के निकट संपर्क में आती हैं, बल्कि अंतरक्रिया करते हुए एक-दूसरे बहुत कुछ ग्रहण करती हैं, खुद में बदलाव लाती हैं और दूसरी संस्कृतियों पर भी प्रभाव छोड़ती हैं। दर्जन भर भाषाओं के जानकार संजय सुब्रमण्यम के इतिहासलेखन में स्रोतों की विविधता और उनका ऐतिहासिक विश्लेषण अद्भुत है। यह उनकी अनेक किताबों में, ख़ासकर “थ्री वेज़ टू बी एलियन” (2011) में दिखता है, जिसमें वे आरंभिक आधुनिक काल के तीन यात्रियों, अली बिन युसुफ़ आदिल ख़ान, एंथनी शर्ले और निकोलो मनूची, के यात्रा-विवरणों का दिलचस्प विश्लेषण करते हैं।

अपनी पहली किताब “पॉलिटिकल इकॉनमी ऑफ कॉमर्स” (1990) में संजय ने दक्षिण भारत में 16वीं-17वीं सदी के दौरान तटीय व्यापार और स्थलमार्गीय व्यापार की परस्पर पूरकता और उनके अंतर्विरोध; सामुद्रिक व्यापार की दुनिया (जिसमें व्यापारियों और बंदरगाहों के नेटवर्क भी शामिल है) के विस्तार और उसमें आते बदलावों; यूरोप और एशिया के व्यापारिक हितों में टकराहट और उसमें निहित राजनीतिक भागीदारी का विश्लेषण किया।

पुर्तगाली साम्राज्य पर आधारित अपनी दूसरी किताब में, “द पोर्तुगीज़ एम्पायर इन एशिया” (1992), संजय ने 15वीं-16वीं सदी के दौरान आरंभिक आधुनिक एशियाई समाजों का ब्योरा दिया, साथ ही, उन्होंने तेरहवीं से पंद्रहवीं सदी के पुर्तगाली राज्य और समाज का; 16वीं सदी में पुर्तगालियों के साम्राज्य-विस्तार के प्रयासों का; और पुर्तगाली साम्राज्य के एशियाई समाजों पर प्रभाव और एशियाई संपर्क में आने से पुर्तगाली समाज पर पड़े प्रभावों का भी अध्ययन किया। संजय ने वास्को डी गामा की एक ऐतिहासिक जीवनी भी लिखी: “द कैरियर एंड लीजेंड ऑफ वास्को डी गामा” (1997)।

2001 में प्रकाशित हुई अपनी किताब “पेनम्ब्रल विजन्स: मेकिंग पॉलिटीज़ इन अर्ली मॉडर्न साउथ इंडिया” में, संजय ने राजनीतिक संरचनाओं के विकास प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। दक्षिण भारत के राज्यों, मसलन, मैसूर, तंजौर और आरकाट आदि के हवाले से संजय ने आरंभिक आधुनिक काल के देशज समाजों की गतिशीलता, उन समाजों में सक्रिय राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रियाओं और उन पर पड़ने वाले योरोपीय प्रभावों को गहराई से समझा।
साथ ही, उन्होंने भारतीय समाजों के इन अनुभवों की तुलना, लातिन अमेरिकी समाज और ऑटोमन साम्राज्य के उपनिवेशवाद के अनुभवों से करने की कोशिश की।

यूरेशियाई साम्राज्यों के विस्तार और उनकी मुठभेड़ पर आधारित अपनी किताब “कोर्टली एनकाउंटर्स” (2012) में, संजय ने इन मुठभेड़ों से उपजने वाली उलझन, विद्वेष और अचरज के भाव का ऐतिहासिक ब्योरा दिया। दरबार उनके लिए एक ऐसी जगह है, जहाँ न सिर्फ यूरेशियाई साम्राज्यों एक-दूसरे के मुखातिब होते हैं, बल्कि जहाँ इस्लाम, हिंदू, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक मतों का भी आमना-सामना होता है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान की जटिल प्रक्रिया को समझने के क्रम में वे इसका भी विश्लेषण करते हैं कि तत्कालीन यूरोपीय चित्रों में दक्षिण एशियाई साम्राज्यों को कैसे पेश किया गया और यह भी कि चित्रकारी की दक्षिण एशियाई शैलियों ने, ख़ासकर मुग़लकालीन कला ने, यूरोपीय चित्रकारों को कैसे प्रभावित किया।

इस वर्ष प्रकाशित अपनी किताब “यूरोप्स’ इंडिया वर्ड्स, पीपुल, एंपायर्स” में संजय ने “ओरियंटलिज़्म” के विमर्श से परे जाकर, 16वीं-18वीं सदी के भारतीय और दक्षिण एशियाई समाज को समझने की कोशिश की है। इस किताब में, वे तत्कालीन भारतीय समाज में ‘धर्म’ की विकसित होती अवधारणा, औपनिवेशिक ज्ञान उत्पादन और भारत-पुर्तगाल के बीच होने वाली अंतःक्रिया का भी गहन विश्लेषण करते हैं।

संजय ने, इतिहासकार मुज़फ्फ़र आलम के साथ भी मुग़ल साम्राज्य के विभिन्न पहलुओं पर काम किया है (देखें, “राइटिंग द मुग़ल वर्ल्ड” [2011]; “इंडो-पर्शियन ट्रैवेल्स इन एज़ ऑफ डिस्कवरीज, 1400-1800”)। साथ ही, वी. नारायण राव और डेविड शूलमान के साथ मिलकर, उन्होंने 17वीं-18वीं सदी के दौरान दक्षिण भारत में इतिहासलेखन की परंपरा पर भी एक किताब लिखी है: “टेक्सचर्स ऑफ टाइम” (2003 में प्रकाशित)।

शुभनीत कौशिक ने यह लेख 22 फ़रवरी 2017 को अपने फ़ेसबुक वाल पर लिखा था।