Shubhneet Kaushik


फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने गुजराती पत्रिका ‘नवजीवन’ में एक लेख लिखा, शीर्षक था ‘बलिया में दमन’। यह लेख असहयोग आंदोलन के दौरान गोरखपुर में चौरी-चौरा कांड होने के बाद बलिया समेत अनेक ज़िलों में किए जा रहे पुलिसिया दमन और बर्बरता के बारे में था। ‘नवजीवन’ में यह लेख चौरी-चौरा की घटना के पाँच दिनों बाद 9 फरवरी 1922 को छपा था। लेख में महात्मा गांधी ने देवदास गांधी का वह पत्र भी उद्धृत किया था, जिसमें उन्होंने बलिया में पुलिस द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का ब्यौरा दिया था। देवदास गांधी उस समय बलिया में ही थे और बाद में वहीं से वे गोरखपुर गए। जहाँ से उन्होंने महात्मा गांधी को लिखे पत्रों में गोरखपुर का आँखों-देखा हाल भी बयान किया।

बलिया और वहाँ के लोगों के बारे में महात्मा गांधी इस लेख में लिखते हैं : ‘बलिया संयुक्त-प्रांत का एक गरीब ज़िला है। वहाँ के लोग उत्साही, सीधे-सादे और भोले हैं। वे देशभक्त हैं। मैंने कई बार वहाँ जाने का प्रयत्न किया, परंतु जा नहीं सका। वह बिहार की सरहद पर है; इससे वहाँ के लोग बिहारियों से अधिक मिलते-जुलते हैं।’

बलिया में हो रहे अत्याचारों का विवरण देवदास गांधी के पत्र से उद्धृत करने के बाद गांधी ने लिखा कि ‘दमन से बलिया के लोगों की जो दशा हुई होगी मैं उसकी कल्पना कर सकता हूँ। उस कल्पना से मेरा दिल रो उठता है। मैं वहाँ न जा सका; इससे मुझे दुख होता है। यदि मैं इस वेदना से पार पा गया तो बलिया को तीर्थ मानकर वहाँ की यात्रा करने की इच्छा रखता हूँ। मैं चाहता हूँ कि इससे बलिया के लोगों को कुछ सांत्वना मिले।’

राष्ट्रीय आंदोलन में बलिया की भागीदारी और बलिया के लोगों द्वारा किए गए बलिदानों को सराहते हुए गांधी ने लिखा कि ‘बलिया जैसे शहरों के बलिदान इस देश को अवश्य मुक्त करेंगे। परमात्मा बलिया के लोगों को कष्ट सहने की और अधिक शक्ति प्रदान करे।’ इतना ही नहीं उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि गुजरात के लोग भी बलिया के उदाहरण से प्रेरणा लेंगे और कहा : ‘मेरी कामना है कि बलिया के उदाहरण से गुजरात के लोगों में कष्ट सहन करने की और भी अधिक उत्सुकता पैदा हो।’

[संदर्भ : सम्पूर्ण गांधी वांगमय, खंड 22]