ध्रुव गुप्त

उन्नीसवी सदी के महान लेखक, कवि, नाटककार, व्यंगयकार, निबंधकार भारतेंदु हरिश्चन्द्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह कहा जाता है। रीतिकाल की सामंती संस्कृति की विकृति और देहवाद के दलदल से निकाल कर हिंदी साहित्य को अपने समय और जीवन से जोड्ने का श्रेय बहुत हद तक उन्हें ही जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में भारतेन्दु ने देश की गरीबी, पराधीनता, हताशा और शासकों की अमानवीयता को पहली बार हिंदी साहित्य का विषय बनाया। वैसे तो नाटक उनके पहले भी लिखे जाते थे, लेकिन खड़ीबोली हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु से ही माना जाता है। चौतीस साल के संक्षिप्त जीवन में उन्होंने विविध विषयों पर चालीस से ज्यादा पुस्तकें लिखीं। विपुल लेखन के अलावा उन्होंने ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाल बोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर खड़ीबोली के रचनाकारों की एक पीढ़ी तैयार की थी। कुछ रूढ़िवादी आलोचक उन्हें उर्दू के विरोध में खड़ा करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भारतेंदु की रचनाशीलता का एक लगभग ओझल पक्ष यह है कि वे उर्दू के अध्येता ही नहीं, उर्दू के बेहतरीन रचनाकार भी थे। उन्होंने ‘रसा’ उपनाम से उर्दू में कई खूबसूरत ग़ज़लें कही थी। पुण्यतिथि (6 जनवरी) पर भारतेंदु हरिश्चन्द्र भावभीनी श्रधांजलि, उनकी एक दुर्लभ ग़ज़ल के साथ !

आ गई सर पर कज़ा लो सारा सामां रह गया
ऐ फ़लक क्या क्या हमारे दिल में अरमां रह गया

बागबां है चार दिन की बाग़े आलम में बहार
फूल सब मुरझा गए, ख़ाली बियाबां रह गया

इतना एहसां और कर लिल्लाह ऐ दस्ते जनूं
बाकी गर्दन में फकत तारे गिरेबां रह गया

याद आई जब तुम्हारे रूप रौशन की चमक
मैं सरासर सूरते आईना हैरां रह गया

ले चले दो फूल भी इस बाग़े आलम से न हम
वक़्त रेहलत हैफ है ख़ाली ही दामां रह गया

मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम
हौसला सब दिल का दिल में ही मेरी जां रह गया

नातवानी ने दिखाया ज़ोर अपना ऐ ‘ रसा ‘
सूरते नक्शे क़दम मैं बस नुमायां रह गया

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।