Prashant Tandon

लाहौर गुरुद्वारा शहीदगंज सदियों पुराने मुस्लिम सिख विवाद, सुलह और कानून के राज की नायाब मिसाल है. पाकिस्तान आज मुस्लिम बाहुल इस्लामिक रिपब्लिक है जहां कुल 6000 के करीब सिख आबादी है (पाकिस्तान के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक). इसके बावजूद गुरुद्वारा शहीदगंज लाहौर में मौजूद है और यहां रोज़ गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ भी होता है.

मस्जिद पर कब्जा कर के बना था गुरुद्वारा शहीदगंज

जहां आज ये गुरुद्वारा हैं वहां कभी अब्दुल्ला खाँ मस्जिद हुआ करती थी जिसकी तामीर शाहजहाँ के शासन के दौरान 1722 में हुई थी. अब्दुला खाँ शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह के खानसामा थे और बाद में वो लाहौर के कोतवाल भी बने. 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पंजाब के गवर्नर जकरिया खाँ ने सिखों पर बहुत ज़ुल्म ढाये. मुगलों के खिलाफ संघर्ष में सिखों के एक मददगार तरु सिंह को जकरिया खाँ के आदेश पर सारे आम प्रताड़ित कर के मार डाला गया. ये हादसा अब्दुला खाँ मस्जिद के पास ही हुआ था. सिखों ने तरु सिंह को शहीद का दर्जा दिया और उस इलाके को शहीदगंज का नाम भी दिया.

1762 में सिखों ने युद्ध में जीत हासिल कर के लाहौर पर कब्जा बना लिया और शहीदगंज की अब्दुल्ला खाँ मस्जिद में मुसलमानों की आवाजाही पर रोक लगा दी. इसी मस्जिद के आहते में तब ही एक गुरुद्वारा भी बनाया गया जिसे नाम दिया गया गुरुद्वारा शहीदगंज भाई तरु सिंह.

लंबी कानूनी लड़ाई

ब्रिटिश राज के दौरान 1849 से 1883 तक मुस्लिम और सिखों के बीच ये मामला कई बार अदालतों में गया पर सभी अदलातों में यथाथिति बनाए रखने के ही आदेश आए – यानि गुरुद्वारा नहीं हटाया गया. शहीद गंज मस्जिद के ट्रस्टी नूर मुहम्मद सारी ज़िंदगी मस्जिद पर कब्जा हासिल करने के लिये कानूनी लड़ाई लड़ते रहे.

1935 में ये संपत्ति सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अधीन आ गई जिसके बाद सिखों ने उस आहते में मस्जिद के अवशेष गिराने शुरू किए जिसे लेकर वहां कई बार दंगे हुए, फायरिंग हुई और कर्फ़्यू लगे. मामला एक बार फिर हाई कोर्ट पहुंचा जिस पर अदालत ने ये माना कि परिसर मस्जिद ही है लेकिन यथाथिति बनाए रखने का आदेश दिया.

आज़ादी और बटवारे के बाद 1950 में एक बार फिर ये मामला कई बार अदालतों में गया लेकिन पाकिस्तान की अदालतों ने भी पिछले आदेशों में कोई तबदीली नहीं की. 1990 के दशक में सिखों की तरफ से 2004 शहीदगंज गुरुद्वारे की मरम्मत की अर्ज़ी दी गई जिसका वहां कई मुस्लिम संगठनों ने भारी विरोध किया लेकिन स्थानीय लोग गुरुद्वारे के पक्ष में थे और आखिरकार 2004 में पाकिस्तान की सरकार की इजाज़त के बाद इस गुरुद्वारे का नवीनीकरण किया गया.

जो मिसाल पाकिस्तान की अदालतों ने और वहां की बहुसंख्य मुस्लिम आबादी ने गुरुद्वारा शहीदगंज में कायम की है भारत की अदालतों और हिन्दू समाज के लिए नज़ीर है जिसकी रौशनी में अयोध्या मसले का हल निकालना चाहिये.