कई सालों पहले, समाजशास्त्री त्रिलोकी नारायण पाण्डेय ने मुझसे एक घटना का ज़िक्र किया था, जो जवाहरलाल नेहरू और हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से जुड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री नेहरू तब अपनी चीन की यात्रा से लौटे ही थे और अपने गृहनगर इलाहाबाद में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। वह इलाहाबाद, जहाँ तब निराला रहा करते थे और त्रिलोकी पाण्डेय तब छात्र हुआ करते थे। निराला सभा में अगली पंक्ति में बैठे हुए थे, खुला हुआ सीना, जिस पर अभी-अभी तेल की मालिश हुई थी। ऐसा लगता था जैसे निराला, जो कुश्ती के दाँव-पेंच में भी महारत रखते थे, सीधे अखाड़े से होकर सभा में चले आए हों। निराला अपनी उस अनूठी मुद्रा में सबके आकर्षण का केंद्र थे। नेहरू ने अपना भाषण शुरू करने से पहले अपने कुछ प्रशंसकों द्वारा पहनाई जा रही मालाओं को स्वीकार किया।

और फिर अपना भाषण शुरू करते हुए नेहरू ने एक किस्सा सुनाया, “मैं चीन से लौटा हूँ और वहाँ मैंने एक कहानी सुनी। एक महान राजा और उसके दो बेटों की कहानी। एक चतुर और दूसरा मूर्ख। जब ये बेटे बड़े हो गए, तो राजा ने कहा कि मेरा मूर्ख बेटा राजा बनेगा, क्योंकि वह सिर्फ़ शासक बनने लायक ही है। पर मेरा चतुर और विद्वान बेटा कवि बनेगा क्योंकि वह महान कार्य करने के लिए बना हुआ है”। यह कहकर नेहरू ने अपने गले से माला उतारी और श्रद्धाभाव से निराला के पैरों की तरफ उछाल दिया।

कुछ दस्तावेज़

हाल ही में, मुझे कुछ ऐसे दस्तावेज़ मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि वास्तव में नेहरू निराला के प्रशंसक तो थे ही, उन्हें निराला से गहरा स्नेह भी था। यह प्रमाण मुझे मिला, डी.एस. राव द्वारा लिखे गए साहित्य अकादेमी के इतिहास, “फ़ाइव डिकेड्स” के परिशिष्ट में। साहित्य अकादेमी का औपचारिक उद्घाटन संसद के केंद्रीय हाल में 12 मार्च, 1954 को हुआ था। अगले ही दिन यानी 13 मार्च को प्रधानमंत्री नेहरू ने साहित्य अकादेमी के नवनियुक्त सचिव कृष्ण कृपलानी को निराला के बारे में एक ख़त लिखा। नेहरू ने लिखा कि “निराला पहले भी काफी सृजनात्मक लेखन कर चुके हैं और आज भी जब अपने रौ में लिखते हैं तो कुछ बेहतर लिखते हैं”। निराला की किताबें तब लोकप्रिय थीं और पाठ्य-पुस्तकों के रूप में भी उन्हें पढ़ा जाने लगा था। पर नेहरू के शब्दों में, “निराला ने अपनी किताबों को महज़ 25, 30 या 50 रूपये पाकर प्रकाशकों को दे दिया, लगभग सारी किताबों के कॉपीराइट वे (निराला) प्रकाशकों को दे चुके थे”। नतीजा यह कि “प्रकाशक तो निराला की किताबों को बेचकर अच्छा-ख़ासा धन कमा रहे थे, पर निराला मुफ़लिसी में जी रहे हैं”।

नेहरू द्वारा अकादेमी को दिये गए सुझाव

नेहरू ने अपने ख़त में लिखा कि “निराला का उदाहरण प्रकाशकों द्वारा एक लेखक के शोषण का ज्वलंत उदाहरण हैं”। नेहरू ने अकादेमी से आग्रह किया कि वह कॉपीराइट कानून में कुछ ऐसे बदलाव करे, जिससे भविष्य में भारतीय लेखकों का कोई शोषण न हो। आगे नेहरू ने लिखा: “इस दौरान निराला को कुछ आर्थिक मदद जरूर दी जानी चाहिए। यह आर्थिक मदद सीधे तौर पर निराला के हाथ में नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वे तुरंत ही इसे किसी दूसरे जरूरतमंद को दे देंगे। असल में, वे अपने कपड़े और सारी चीजें ऐसे ही लोगों को दे दिया करते हैं”।

उस समय महादेवी वर्मा और इलाहाबाद के एक साहित्यिक संगठन से जुड़े सदस्य निराला की जरूरतों का खयाल रखते थे और उनकी आर्थिक मदद भी किया करते थे। नेहरू ने अकादेमी को सुझाव दिया कि निराला को सौ रुपए की मासिक वृत्ति दी जाय, और यह रकम निराला के एवज में महादेवी वर्मा को दी जाय। 16 मार्च 1954 को अकादेमी के सचिव ने नेहरू को जवाबी ख़त लिखा। सचिव ने लिखा कि उन्होंने अपने मंत्रालय के प्रमुख मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से बात की है और उन्होंने इस बात के लिए अपनी सहमति दे दी है कि “निराला को सौ रूपये की मासिक वृत्ति दी जाए और यह रकम महादेवी वर्मा को सौंपी जाए”।

सरकारी कामों और निर्णय लेने की गति को ध्यान में रखें तो यह सब कुछ मानो प्रकाश की गति से हुआ, तीन दिनों के भीतर निर्णय भी ले लिए गए और उनका क्रियान्वयन भी कर दिया गया! आज के भारत यह सोचना भी असंभव है कि एक कवि की तंगहाली से चिंतित होकर, कोई प्रधानमंत्री उसे आर्थिक मदद देने की बात सुझाते हुए ख़त लिखेगा और यह भी बताएगा कि यह किसके हाथों में या किसके जरिए दी जाय। पर यह उस हिंदुस्तान में बिलकुल संभव था जो नेहरू और आज़ाद का हिंदुस्तान था। और यह प्रवृत्ति सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी तक ही नहीं सीमित थी। डी.एस. राव ने साहित्य अकादेमी के अपने इतिहास में, कम्युनिस्ट सांसद हीरेन मुखर्जी और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के खतों का भी हवाला दिया है, जो साहित्य अकादेमी के आरंभिक वर्षों में उसकी गतिविधियों और कार्यों पर की गई टिप्पणियाँ थीं।

निराला का कवित्व

कवि निराला के प्रशंसकों में अरविंद कृष्ण महरोत्रा और विक्रम सेठ सरीखे साहित्यकार भी रहे हैं। निराला की कविताओं का अँग्रेजी में अनुवाद करने वाले डेविड रूबिन ने “सेलेक्टेड पोयम्स ऑफ निराला” में लिखा है कि “निराला के काव्य में जितनी विविधता है, वह 20वीं सदी के हिंदी के किसी भी दूसरे कवि से कहीं ज्यादे और समृद्ध है”। निराला ने प्रकृति, राजनीति, गरीबी, मिथक, भाषा और प्रेम जैसे विविध विषयों पर कविताएं लिखीं। निराला की एक कविता “वन-बेला” का यह अंश जैसे ख़ुद इस लेख पर भी एक टिप्पणी है:

फिर लगा सोचने यथासूत्र – मैं भी होता
यदि राजपुत्र – मैं क्यों न सदा कलंक ढोता,
ये होते – जितने विद्याधर – मेरे अनुचर,
मेरे प्रसाद के लिए विनत-सिर उद्यत-कर;
मैं देता कुछ, रख अधिक, किन्तु जितने पेपर,
सम्मिलित कंठ से गाते मेरी कीर्ति अमर,
जीवन चरित्र
लिख अग्रलेख, अथवा छपते विशाल चित्र।

(अनुवाद: शुभनीत कौशिक)
साभार: द हिंदू, 12 मार्च 2006.