ध्रुव गुप्त

नीरज जी को उनके छंदबद्ध गीतों और गीतिकाओं के सौन्दर्य के लिए जाना जाता है, लेकिन एक विचित्र तथ्य यह भी है कि हिंदी सिनेमा में छंदमुक्त गीतों के जन्मदाता भी वही थे। फिल्म थी ‘मेरा नाम जोकर’। राज कपूर को सर्कस के विदूषक की अपनी भूमिका में गाने के लिए लीक से हटकर कुछ चाहिए था। गीत की रचना के लिए उनके यहां एक बैठक हुई जिसमें नीरज जी के अलावा संगीतकार शंकर जयकिशन शामिल थे। कई-कई विकल्पों पर बात चली, लेकिन राज जी को उनसे संतोष नहीं हुआ। उन्हें अपने हर काम में परफेक्शन चाहिए था। कुछ अलग और थोडा भव्य। देर रात बिना नतीजे के गोष्ठी विसर्जित हो गई। यह सिलसिला चार रातों तक चला। पांचवीं रात नीरज जी ने गीत में कुछ नया प्रयोग करने की अनुमति मांगी। सोचते-सोचते किसी और प्रसंग में उनके मुंह से निकल गया – ‘ऐ भाई, ज़रा देख के चलो’ ! राज जी को गीत के मुखड़े के तौर पर यह पंक्ति पसंद आई तो बात आगे बढ़ी। गीत बनकर तैयार हुआ जिसमें जीवन की विवशता, क्षणभंगुरता और संसार की नश्वरता का दर्शन था। गीत सुनकर शंकर जयकिशन ने हाथ खड़े कर दिए – ‘इसकी धुन बनाना मेरे लिए मुमकिन नहीं। यह कैसा गीत है जिसमें न तो मुखड़ा है और न अंतरा है। यह है क्या चीज़’ ?’ राज जी ने कहा – ‘कविता तो अच्छी है, लेकिन फिल्म के लिए इसे धुन में बांधना मुश्किल होगा।’ नीरज जी ने उन्हें समझाया – ‘इस फिल्म का केन्द्रीय पात्र जोकर है। वह अपनी बात परिष्कृत नहीं, थोड़े व्यंग्यात्मक और थोड़े विचित्र तरीके से ही कहेगा। उससे क्लासिकल या बंधे-बंधाए तरीके से गाने की आप उम्मीद नहीं कर सकते’। 

कुछ सोचकर राज कपूर ने नीरज जी से कहा – ‘अच्छा, इस गीत को आपको मंच पर गाना हो तो कैसे गाएंगे ?’ नीरज जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में इस मुक्त छंद गीत को गाना शुरू कर दिया। शंकर जय किशन और राज जी इस धुन पर ‘वाह वाह’ कर बैठे। अंततः नीरज जी की गायन-शैली की तर्ज़ पर गीत की धुन तैयार हुई जिसे मन्ना डे ने अपनी बुलंद, गंभीर और दार्शनिक आवाज़ देकर अमर कर दिया। नीरज जी की देखा-देखी बाद में गीतकार आनंद बख्सी ने भी फिल्मों में कई छंदमुक्त गीत लिखे जिनमें से एक ‘अच्छा तो हम चलते हैं’ बहुत मकबूल हुआ था। 
(नीरज जी के एक संस्मरण के आधार पर)

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।