आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है प्रसिद्ध भारतीय कवि और गायक प्रदीप द्वारा लिखा गया देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण एक ओजस्वी गीत है। वर्ष 1943 में फ़िल्म ‘किस्मत’ के लिए इस गीत को अमीरबाई और ख़ान मस्ताना ने गाया था, जबकि गीत का संगीत अनिल बिस्वास ने तैयार किया था।

चल-चल रे नौजवान’ के बाद गीतकार प्रदीप ने ‘पुनर्मिलन’ (1940), ‘अनजान’ (1941), झूला (1941) तथा ‘नया संसार’ (1941) के गीत लिखे। ‘झूला’ में दार्शनिकता से ओतप्रोत गीत ‘न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे’ से स्वयं इसके गायक अशोक कुमार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि यह गीत उनकी अंतिम यात्रा में बजाया जाए। फिर 1943 में सभी कीर्तिमानों को भंग करने वाली प्रदीप और अनिल बिस्वास के गीत-संगीत से सजी, अशोक कुमार की अदाकारी से मकबूल, अमीर बाई की खनकती आवाज़ में निबद्ध, टिकट खिड़की को ध्वस्त करने वाली सामाजिक आशय का सम्यक स्वरूप निरूपित करती फ़िल्म ‘किस्मत’ आई। यह फ़िल्म कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के ‘रॉक्सी थियेटर’ में लगातार तीन वर्ष तथा आठ महीने तक प्रदर्शित की जाती रही। प्रदीप के गीत इस फ़िल्म के प्राण थे। चाहे ‘धीरे-धीरे आ रे बादल हो’ या ‘अब तेरे बिना कौन मेरा कृष्ण कन्हैया रे’ अथवा ‘दुनिया बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा’ और ‘पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाय रे’ हो सभी प्रसिद्ध हुए और जन-जन के मुख पर आ गए। गीतों के रिकॉर्डों की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री हुई। लेकिन फ़िल्म के सभी गीतों का शिरोमणि गीत था- आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है। इस गीत के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी के आदेश दिया था जिसकी वज़ह से प्रदीप को अरसे तक भूमिगत होना पड़ा था।

जेल में बंद आज़ादी के दीवाने इस गीत को अक्सर गुनगुनाया करते थे, जिससे उनकी देशभक्ति की आग मद्धिम न हो। पण्डित जवाहरलाल नेहरू भी उनमें से एक थे।

आज हिमालय की चोटी से
फिर हम ने ललकरा है.

दूर हटो ऐ दुनिया वालों
हिन्दुस्तान हमारा है.

जहाँ हमारा ताज-महल है
और क़ुतब-मीनारा है.

जहाँ हमारे मन्दिर मस्जिद
सिखों का गुरुद्वारा है.

इस धरती पर क़दम बढ़ाना
अत्याचार तुम्हारा है.

शुरू हुआ है जंग तुम्हारा
जाग उठो हिन्दुस्तानी.

तुम न किसी के आगे झुकना
जर्मन हो या जापानी.

आज सभी के लिये हमारा
यही क़ौमी नारा है.