ध्रुव गुप्त

चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के अप्रतिम योद्धा और अपने सभी समकालीन क्रांतिकारी साथियों के लिए एक बेहद सम्मानित व्यक्तित्व थे।

महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की समाप्ति की अप्रत्याशित घोषणा के बाद वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और सबसे पहले राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी काण्ड को अंजाम दिया।

1927 में बिस्मिल और उनके चार साथियों की शहादत के बाद उन्होंने सभी प्रमुख क्रांतिकारी साथियों को जोड़कर एकीकृत ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ बनाया और भगत सिंह के साथ लाहौर में सॉन्डर्स की हत्या कर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया और दिल्ली में असेंबली बम काण्ड में शामिल हुए।

27 फ़रवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रे़ड पार्क में अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ में वे वीरगति को प्राप्त हुए।

आईए, हम अपने देश की एकता, अखंडता और नवनिर्माण लिए कुछ भी कर गुज़रने की शपथ के साथ उनकी शहादत को सलाम करें, शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की एक नज़्म के साथ !

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हमको भी पाला था मां-बाप ने दुख सह-सह कर

वक्त-ए-रूख़सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आंसू कभी टपके जो रूख़ से बह कर

तिफ़्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !
दिल फ़िदा करते हैं, कुरबान जिगर करते हैं

पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खान-ए-वीरान कहां देखिए घर करते हैं

ख़ुश रहो अहले-वतन हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को !

लेखक पुर्व आईपीएस हैं