Shubhneet Kaushik

खुद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े रहे और ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सदस्य रहे जयचंद्र विद्यालंकार लाहौर के नेशनल कॉलेज में भगत सिंह और सुखदेव के शिक्षक थे। नेशनल कॉलेज की स्थापना असहयोग आंदोलन के दिनों में लाला लाजपत राय ने की थी। इसी कॉलेज में भगत सिंह और सुखदेव इतिहास के अध्यापक जयचंद्र विद्यालंकार के संपर्क में आए।

भविष्य के इन दोनों महान क्रांतिकारियों को क्रांतिकारी आंदोलन से जोड़ने वाले जयचंद्र विद्यालंकार ही थे। जयचंद्रजी ने भगत सिंह और सुखदेव का परिचय शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा स्थापित क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एच.आर.ए.) से कराया। बाद में, सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला मैदान में हुई क्रांतिकारियों की एक बैठक में भगत सिंह के प्रस्ताव पर एच.आर.ए. के नाम में ‘सोशलिस्ट’ भी जोड़ा गया और संगठन का पूरा नाम तब ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एच.एस.आर.ए.) रखा गया।

जयचंद्रजी के कहने पर भगत सिंह कानपुर गए, जहाँ उन्हें ओजस्वी पत्रकार और राष्ट्रवादी नेता गणेश शंकर विद्यार्थी का सान्निध्य मिला। इसी दौरान भगत सिंह ने ‘बलवंत’ उपनाम से ‘प्रताप’ में क्रांतिकारियों के जीवन और क्रांतियों के इतिहास पर अनेक लेख लिखे। विद्यार्थीजी के माध्यम से कानपुर में रहते हुए ही भगत सिंह मुजफ्फर अहमद, सत्यभक्त, राधामोहन गोकुल, शौकत उस्मानी आदि के संपर्क में आए।

जयचंद्रजी ने अपने प्रिय शिष्य भगत सिंह की याद में एक लेख लिखा था, “वह नेशनल कॉलेज में मेरा विद्यार्थी था”। यह लेख सुधीर विद्यार्थी द्वारा संपादित किताब ‘शहीद भगत सिंह क्रांति का साक्ष्य’ (राजकमल प्रकाशन) में संकलित है। अवसर मिले तो यह किताब और खासकर जयचंद्रजी द्वारा भगत सिंह के बारे में लिखा लेख जरूर पढ़ें।

बतौर इतिहासकार जयचंद्रजी ने अनेक किताबें लिखीं, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध रही “भारतीय इतिहास की रूपरेखा”। यह किताब हिंदुस्तानी एकेडेमी (इलाहाबाद) द्वारा 1933 में प्रकाशित की गई थी। तीन खंडों में बंटी इस किताब का पहला खंड भारत की भौगोलिक पृष्ठभूमि के बारे में जबकि बाकी के दो खंड भारत के प्राचीन इतिहास से संबन्धित थे। इस किताब के लिए उन्हें ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ भी दिया गया।

जयचंद्रजी के इतिहासलेखन पर गौरीशंकर हीराचंद ओझा और काशी प्रसाद जायसवाल के इतिहासदृष्टि की छाप बिलकुल स्पष्ट है। जयचंद्रजी तीस के दशक में मराठी इतिहासकार जी.एस. सरदेसाई (1865-1959) के संपर्क में आए और सरदेसाई के लेखन से बेहद प्रभावित हुए। इसका ज़िक्र उन्होंने 1955 में छपी अपनी किताब ‘पुरखों का चरित’ (हिंदी भवन से प्रकाशित) में भी किया है। ‘इतिहासप्रवेश भारतीय इतिहास का उन्मीलन’, ‘भारतीय इतिहास की मीमांसा’ जयचंद्रजी की अन्य किताबें हैं।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार के साथ मिलकर जयचंद्रजी ने दिसंबर 1937 में ‘भारतीय इतिहास परिषद’ की भी स्थापना की थी। हालांकि कतिपय कारणों ‘इतिहास परिषद’ अपने उद्देश्यों में सफल न हो सकी। सीतामऊ के इतिहासकार डॉ. रघुबीर सिंह भी, जिन्होंने ‘पूर्वमध्यकालीन भारत’ किताब लिखी थी, जयचंद्रजी के निकट संपर्क में थे। सत्यकेतु विद्यालंकार और चंद्रगुप्त विद्यालंकार आदि के साथ जयचंद्रजी ने गुरुकुल कांगड़ी में भी इतिहास पढ़ाया।

नेशनल कॉलेज में अध्यापन के दौरान ही जयचंद्रजी ने पंजाब प्रांत में हिंदी-नागरी के प्रचार-प्रसार का काम जोरों से किया। वे हिंदी साहित्य सम्मेलन से जुड़े रहे। सम्मेलन द्वारा तीस के दशक में आयोजित की गई इतिहास परिषदों के वे कई बार सभापति रहे। आज़ादी के बाद सन 1950 में कोटा में हुई हिंदी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन के वे सभापति भी रहे।